अज्ञातवास
अज्ञातवास
"तुम 15 दिन घर क्या रहे; घर तुम्हें अज्ञातवास लग रहा है! तुम्हारी तो ऑफिस की मीटिंग होती हैं, सहकर्मियों के फोन आते रहते हैं, तनख्वाह मिल रही है। घर बैठे पकवान खा रहे हो; ये अज्ञातवास है तो हमारा क्या? कभी सोचा भी है?" - राखी ने उत्तम से कहा।
उत्तम 15 दिन के लॉकडॉउन में घर से काम करके इतना बोर हो गया था कि खुद का ही घर उसे कैद खाना लग रहा था।घर बैठे उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। जब देखो छोटी छोटी बातों पर कभी मां - पिताजी , कभी पत्नी , कभी बच्चों पर झुंझलाता रहता।एक दिन राखी ने बोल ही दिया -" आप इतना गुस्सा क्यू करते हो। हम भी तो घर बैठे हैं, हमे तो गुस्सा नहीं आ रहा!"
उत्तम -" तुम्हें तो आदत है घर रहने की। मैं और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा हूं। ना जिम खुलें है ना पार्क । ऐसा लग रहा है अज्ञातवास की सजा काट रहा हूं।"
राखी सारे घर का काम अकेले निपटाती थी, लोकडाउन में तो काम दुगना हो गया था।
सासू मां से तो खुद खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। उत्तम आधा दिन अपने काम में लगा रहता, फिर झुंझलाना शुरू, पर अपनी डिमांड जरुर बता देता था - आज कचोड़ी, पकोड़े, जलेबी।राखी को अज्ञातवास की बात सुनकर गुस्सा आ गया। उसने सोच लिया आज तो आर पार करना ही है मामला।
राखी -" यहां बैठो !! मेरी बातों के जवाब दो पहले! आज खाना सवाल जवाब के बाद ही बनेगा घर में!! वरना जिसको जो मिले बनाओ और खाओ!"
उत्तम , राखी के गुस्से से वाकिफ था। अब राखी ने ज़िद्द में ठान ली तो ठान ली, या तो मैं बात ही सुन लूं वरना आज का खाना तो मुझे ही बनाना पड़ेगा। अब तो बाहर से लाने या मंगवाने का रास्ता भी बंद।
उत्तम -" अरे!! गुस्सा क्यों हो रही हो। अच्छा चलो पूछो क्या बात है?"
राखी -" अज्ञातवास क्या होता है?"
उत्तम -" अरे !! महाभारत में देखा नहीं कल!! पांडव अज्ञातवास गए थे। अपनी पहचान छुपाकर निश्चित समय तक कहीं रहना। किसी जान पहचान वाले से कोई संपर्क ना होना।"
राखी -" आप तो रोज मीटिंग करते हो ऑनलाइन। खूब दोस्तों के फोन आते हैं। घर की सब्जियां और दूध लेने के बहाने बाहर भी हो आते हो। ये अज्ञातवास है??"
उत्तम -" अरे मैंने वैसे ही कह दिया । तुम तो दिल पर लेकर बैठ गई।"
राखी -" नहीं नहीं!! अब तो सुनो!! अगर ये अज्ञातवास है तो हम औरतों का क्या??
बच्चों के नाम पर नौकरी छुड़वाकर घर बिठा दिया। कोई दोस्तों के साथ घूमना फिरना नहीं। पति और बच्चों की पसंद के पकवान बनाते रहो। कहीं आओ जाओ तो घूंघट रखो। चाहे औपचारिकता के लिए रखो पर सिर से पल्लू ना सरके।हम तो पता नहीं कितने सालों से अज्ञातवास में रह रहे है।शादी से पहले पिता का नाम, शादी के बाद पति का नाम। बड़े होकर बेटे भी आंख दिखाने लगेंगे। तो फिर हमारा अज्ञातवास कब ख़तम होगा??"
उत्तम राखी की कही इतनी गहरी बातें सुनकर हैरान भी था और उदास भी।सचमुच घर में हमारी मां, बहन, पत्नी और सब कैसे रहतीं है पूरे दिन घर।
और फिर घर का काम!! अपनी पसंद से ज्यादा दूसरों का ध्यान!!अगर ये भी मेरी तरह सोचे तो ये तो उम्रभर का अज्ञातवास क्या उम्रकैद जैसी सजा हो गई।
उत्तम -" मुझे माफ़ कर दो। सचमुच मैं तुम्हारे दिल का हाल तो कभी समझ ही नहीं पाया। सचमुच बहुत बड़ी बात है यूं सिर्फ घर रहकर घर का और घरवालों का ध्यान रखना। लाओ आज से आधा आधा काम करेंगे।"
राखी -" ये हुई ना बात!! आधा काम करोगे तो काम में उलझकर ये झुंझलाहट खुद ही ख़तम हो जाएगी। पर हां!! हमारे इस अज्ञातवास का हल ढूंढ़कर मुझे जरुर बताना।"
उत्तम सोच में पड़ गया कि क्या किया जाए। उसने राखी को कहा -" क्यूं ना तुम फिर से अपनी डांस क्लास और पेंटिंग्स बनाना शुरू कर दो!! अज्ञातवास से निकलने का इससे अच्छा हल क्या होगा?? "
राखी ने भी खुशी से हां में हां मिलाई और दोनो लग गए रात के खाने की तैयारी में।
दोस्तों!! इस लॉकडाउन ने बहुत सी चीजों पर सोचने को मजबूर किया है।हम एक मास्क में नहीं रह पा रहे और हमारे देश में आज भी बहुत से गांव में घूंघट प्रथा चल रही है। शहरों में भी जहां ग्रामीण क्षेत्र के लोग रहते हैं आसपास वो भी सिर पर पल्लू तो रखवाते ही हैं। सोचिए वो कैसे जी रहे होंगी पर्दे में!!
जिन औरतों की पहचान घर के कामों में खो गई, वो कैसे जीती होंगी इस अज्ञातवास में!!
