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Anita Bhardwaj

Action


4.5  

Anita Bhardwaj

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लाश

लाश

5 mins 270 5 mins 270

"लाश थी तुम्हारे साथ, जिसे तुमने खुद वक्त वक्त पर जिंदा इंसान से लाश बनाया।

लाश ही जा रही है, लाश की विदाई जरूर होती है पर डोली नही उठती।"

आज तो बस घर छूट रहा है; रिश्ता,अपनापन,तालमेल ये सब छूटे हुए तो एक ज़माना हो गया! हां तुम्हें आज अपनी सामाजिक छवि की चिंता है तो ये दिखावा कर रहे हो।" - छाया ने कमल से कहा।

छाया और कमल की शादी को 6 वर्ष बीत चुके थे ; इन 6 वर्षों में सभी ने उनको एक आदर्श पति पत्नी के जोड़े के रूप में ही देखा था।

कमल ने एक वक्त के बाद छाया के अस्तित्व को नकारना शुरू कर दिया था।

बीवी तो अपनी ही होती है, उसपर हर तरह का हक है।

बीवी पर अपने हक़ तो उसे सभी मालूम थे पर बीवी के प्रति फर्ज़ वो भूल गया था।

छाया ने बहुत कोशिश की कि सब ठीक हो जाए पर एक वक्त ऐसा आया की उसने उम्मीदें करनी ही छोड़ दी।

और अपनी किस्मत समझकर बस दिनों को गुजारना शुरू कर दिया था।

सब दोस्त, रिश्तेदार सबसे दूरी सी बना ली थी छाया ने।

अपना मन समझाने के लिए अक्सर छोटी छोटी कहानियां लिखने लगी थी।

कमल को उसकी ये बेवजह की खुशी जाने क्यों चुभ रही थी।

उसने घर पर कैमरा लगवा दिया ये देखने के लिए कि कहीं छाया किसी और से तो नही बात करने लग गई।

फिर एक दिन ऐसा आया की छाया के सब्र का बांध टूट ही गया, यूं निगरानी में तो कैदी भी नहीं रहते फिर मैं क्यों।

सिर्फ इसलिए की कमल को मैने ही चुना था।

छाया ने घर छोड़ने का फैसला कर ही लिया, अब यहां उसका दम घुटने लगा था।

छाया अपना सामान पैक करके अपने घर जा रही थी तो कमल को याद आया की लोग क्या कहेंगे।

मुझे गलत कहेंगे या कहेंगे की एक औरत ने आदमी को छोड़ दिया।

ये सब सोच ही रहा था कि उसके अंदर से आवाज़ आई; नौकरी तो है नहीं इसके पास; कैसे बच्चे के साथ गुजारा कर पाएगी। कुछ दिन बाद लौट आएगी।

ये सोचकर उसने छाया को समान पैक करने से नहीं रोका।

सुबह छाया ने सामान को एक टेंपो में रखवाना शुरू किया तो कमल ने उसका हाथ पकड़ लिया।

छाया तो जैसे पत्थर हो चुकी थी, वो हर पहलू , हर स्थिति पर पहले से ही सोच चुकी थी।

उसने कमल का हाथ हटाते हुए कहा -" ये हाथ पकड़ने का हक खो चुके हो तुम!"

कमल छाया की आंखों में किसी मरे हुई सी चुप्पी के भाव आज देख पा रहा था उसने कहा -"ये मेरा हक है अब भी तुम्हारा पति हूं। तुम पर अब भी मेरा ही अधिकार है!"

छाया ने अपनी भौंहे चढ़ाते हुए,हल्की मुस्कान देते हुए कहा -"अच्छा पतिदेव ये तो बताएं आज कैसे याद आ गई पत्नी। क्या सिर्फ पति के हक की पढ़ाई ही की है क्या। फर्ज़ नाम के शब्द के बारे में सुना नहीं है शायद। कोई नहीं। अब अच्छा खासा वक्त मिलेगा सोच लेना।"

कमल ने कहा-" तुम जा क्यों रही हो, हमारे बीच सब ठीक तो चल रहा है। अब तो कोई लड़ाई भी नहीं होती। घर का राशन,बिट्टू की फीस किसी चीज की तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं होती फिर और क्या चाहिए!"

छाया ने कहा -" शुक्रिया मुझे एहसास करवाने के लिए की जो कर रही हूं वो बिल्कुल सही है!

रही बात सब सही चलने की तो सही इसलिए लग रहा है क्यूंकि तुम खुद की ज़िंदगी को अच्छे से जी पा रहे हो!

वक्त पर खाना पीना से लेकर बच्चों की परवरिश,तुम्हारे माता पिता की सेवा ; किसी भी चीज की तुम्हें चिंता नहीं करनी पड़ती।

लड़ाइयां अब इसलिए नहीं होती की मैंने तुमसे उम्मीद रखना ही छोड़ दिया है।

जिससे कोई उम्मीद ही न हो उससे क्या शिकायतें करना , क्या झगड़ा करना।

ये राशन और फीस का ताना मुझे न सुनाओ घर तुम्हारा है, बच्चा तुम्हारा है ये सब तो तुम्हें करना ही था और आगे भी करते रहना है!

छोड़ कर इसलिए जा रही हूं क्योंकि यहां रही तो एक दिन शायद ज़िंदगी ही मुझे छोड़ दे।"

कमल ने गुस्से से कहा -" ये कहानियां लिख लिखकर तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। चार लोग जानने क्या लग गए तुम्हारे तो तेवर ही बदल गए हैं।

बिना आदमी के रहोगी तो दुनिया की असलियत 4 दिन में जान जाओगी।

आज के वक्त में नौकरी लगे हुए घर बैठ गए, तुम क्या करोगी!

अपने घमंड और गुस्से के चलते मेरे बच्चे को भी दर दर की ठोकरें खिलाओगी।"

छाया ने कहा -" ये सब कहने के लिए भी शुक्रिया। साथ रहकर तो कुछ दे ना पाए; तुम्हारे ये शब्द रोज मुझे याद दिलाएंगे की जीना है और जीकर दिखाना है।"

अब रास्ता छोड़ो और मुझे जाने दो।

कमल सामने से हट गया ये कहते हुए की जाओ जाओ देखूं कौन तुम्हें रखता है।

छाया कमल की तरफ मुड़ी और कहा -" तुम्हारा यही वहम एक दिन तुम्हें ले बैठेगा।"

कमल ने गुस्से से कहा -" कोई और ठिकाना ढूंढ लिया क्या जो इतनी हिम्मत आ गई तुझमें।"

छाया मुड़ी और कहा -" आ गए ना अपनी औकाद पर। इतनी बात घुमाने की क्या जरूरत थी सीधा ही पूछ लेते।

जब तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारे आगे खुद को परोसना सही नहीं लगा मुझे तो दूसरी बार भी तुम जैसे के साथ रहूंगी ये सोचा भी कैसे।

लाश थी तुम्हारे साथ, जिसे तुमने खुद वक्त वक्त पर जिंदा इंसान से लाश बनाया।

लाश ही जा रही है, लाश की विदाई जरूर होती है डोली नही उठती।

तुम अब ये सोचना तुम्हारे अंदर का मर्द किसी को क्या जवाब देगा की क्या कमी थी जो अपनी ही बीवी छोड़कर चली गई, तुम्हारा दिया ये ठिकाना तुम्हें मुबारक।

छाया ने अपने बेटे का हाथ पकड़ा और चली गई !

कमल बस उसके आखिरी शब्दों में खो गया, लाश !


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