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V. Aaradhyaa

Romance Tragedy Fantasy

4  

V. Aaradhyaa

Romance Tragedy Fantasy

ऐसा क्यूँ

ऐसा क्यूँ

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"जीवन में एक दूसरे की इच्छाओं का मान रखने से प्यार,इज़्ज़त और विश्वास बढ़ता है।"

बोलते हुए आज माधवी को अपने ही शब्द खोखले से लग रहे थे। आज जो बात वो अपनी बेटी को समझा रही थी,काश। समय रहते उसने समझा होता। वो तब कहाँ समझ पाई थी सुधीर की भावनाओं को। बस हमेशा होड़ सी लगी रहती थी दोनों में अपनी बात ऊपर रखने की।

आज जब उसकी खुद की बेटी शिल्पी उसकी गलती दुहराने जा रही थी तो उसे समझ नहीं आ रहा था कि शिल्पी को वही गलती करने से कैसे रोके जिसके पछतावे से वो आजतक बाहर नहीं निकल पाई थी। क्यूँकि बचपन से शिल्पी ऐसी ही थी। वो उसकी वही बात मानती जिसके लॉजिक से वो सहमत होती। अब माँ ने भी तो अपने स्वाभिमान के लिए पापा से तलाक लिया था तो मैं अगर रुद्राक्ष से तलाक लेना चाहती हूँ तो इसमें गलत क्या है?

शिल्पी के तर्क में दम तो था। पर माधवी अपनी बेटी को कैसे समझाए कि स्वाभिमान और ईगो में एक बड़ा सा फर्क होता है। उसकी माँ ने जो किया वो अभिमान था कदाचित स्वाभिमान नहीं।

आज शिल्पी के रुद्राक्ष से तलाक लेने के निर्णय से माधवी का मन बहुत अशांत था। मन बार बार अतीत के गालियारे में एक बार फिर घूम कर आने को बेचैन जान पड़ता था। इसलिए शिल्पी से और ज़्यादा बहस ना करके वो अपने कमरे में आकर

लेट गई।

"ये आजकल के बच्चों में ज़रा भी धैर्य नहीं। रिश्ते निभाने में ज़रा सा त्याग क्या करना पड़ता है कि ये रिश्ते का ही त्याग कर देते हैँ "।

यही तो कहा था माँ ने जब वो सुधीर को छोड़कर आई थी और अपने वापस ना जाने का निर्णय माँ को सुनाया था। पापा रहे नहीं। माँ भी दो साल बाद हाइस्कूल टीचर की नौकरी से रिटायर्ड होनेवाली थी।

ऐसे में माधवी का तलाक लेना माँ को बिल्कुल तोड़ सा गया। अपनी इकलौती नकचढ़ी बेटी को कहती भी क्या। शिल्पी रुद्राक्ष की भावनाओं का मोल नहीं समझ रही थी, बस ज़िद किये बैठी थी कि ट्रांसफर हुआ है प्रमोशन के साथ तो वो ज़रूर जाएगी। आखिर रुद्राक्ष यही तो चाहता था कि वो बंगलौर ना जाकर यहीं लखनऊ में कहीं और जॉब के लिए कोशिश करे। वरना साथ रहेंगे कैसे?

साथ ही उसे इस बात का भी अफ़सोस था कि वो नहीं जा सकता उसके साथ क्यूँकि उसकी सरकारी नौकरी थी। पर शिल्पी को इस आग्रह के पीछे लग रहा है कि रुद्राक्ष उसे आगे नहीं बढ़ने देना चाहता। ये नहीं दीख रहा इस पागल को कि रुद्राक्ष उसे अपने से दूर नहीं करना चाहता।

शिल्पी और रुद्राक्ष का सोचते सोचते उसे फिर से सुधीर की याद आ गई।जैसे सुधीर भी तो यही कहते थे कि सब साथ रहेंगे। माँ बाप का इकलौता बेटा हूँ उनकी सेवा करना मेरा धर्म है। तुम मेरी पत्नी हो,अगर मैं जीवन के सफ़र में तुम्हारा साथ हमेशा चाहता हूँ तो गलत क्या है?

वैसे आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो बात बहुत मामूली सी तो थी। सुधीर चाहता था, माधवी दो एक साल घर में सास ससुर के साथ रहे उनके साथ थोड़ा वक़्त गुजारे, फिर चाहे तो कोई नौकरी कर ले। तबतक दादा दादी बन चुके उसके मातापिता को भी एक खिलौना मिल जायेगा तब वो चाहे तो अपनी नौकरी ज्वाइन कर सकती है। वैसे भी माधवी के प्रेग्नेंट होनें की खबर सुनते ही उसके सास ससुर गाँव से आ गए थे जो माधवी को बिल्कुल पसंद

नहीं आया था। उसने इसका विरोध किया तो सुधीर का अपना तर्क था कि उसके माँ बाप के भी बेटा बहू पोता पोती को लेकर कुछ अरमान हैँ। पर माधवी को लगा वो उसे सताने और नौकरानी जैसा बनाने के लिए ऐसा कह रहा है। तब जो लड़ झगड़ कर मायके आई तो फिर वापस गई ही नहीं। अँगारे की तरह काट ली अबतक की ज़िन्दगी।

अब यही गलती उसकी बेटी को नहीं करने देगी वह।पर कैसे मनाए वो अपनी ज़िद्दी बेटी को जो छोटी सी बात को दिल से लगा बैठी है। पति पत्नी के बारीक़ रिश्ते को समझने की समझ कहाँ है शिल्पी को?

बस इतना ही तो कहा था उसके पति ने कि अगर वो अपना ट्रांसफर ले लेती है तो फिर साथ रहने का मतलब क्या। प्राइवेट नौकरी है। यहाँ छोड़कर कहीं और ट्राइ कर सकती है। इस पर जब शिल्पी ने यह सोच लिया कि पति उसकी नौकरी को कम आँक रहा है या उसे आगे नहीं बढ़ने देना चाहता तो ये उसकी समझ की कमी है।

कई बार हम वही देखते हैँ जो देखना चाहते हैँ। शिल्पी के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा था। पति के कहने का गलत मतलब निकाल रही थी और यह नहीं देख पा रही थी कि वो कितना प्यार करता है उससे कि उसे खुद से दूर नहीं जाने देना चाहता।

अगर शिल्पी को नहीं दिखाई दे रहा पति के कहे का सच, उसका छुपा हुआ प्यार तो माधवी ज़रूर उसे दिखाएगी। अपनी बेटी को पछतावे के अँगारे पर चलने से बचाएगी।

पर तब सुधीर की बातें उसे तानाशाही लगी थी और एक बार लड़ झगड़कर जो मायके आई तो सुधीर के लाख मनाने पर भी नहीं मानी। शिल्पी के जन्म के समय अस्पताल में ही रोते रोते सुधीर ने उसके पैर तक पकड़ लिए थे कि वापस घर चलो। पर तब उसकी एक बचकानी बात ने सुधीर का मन बुरी तरह तोड़ दिया कि अपने माता पिता को गाँव में ही रहने दो। वो गँवार हमारे साथ रहेंगे तो हमारा बच्चा भी वैसा ही हो जायेगा।

इस बात से कदाचित सुधीर इतना आहत हुए थे कि फिर जब माधवी ने तलाक के पेपर भेजे तो उन्होंने चुपचाप साइन करके वापस भेज दिया। जबकि माधवी ने तलाक के पेपर के ज़रिये अपने तुरप का आखिरी पत्ता फेंका था। अपनी बात मनवाने का, सुधीर को और झुकाने का। पर ये खेल माधवी पर इतना भारी पड़ा था कि तमाम उम्र अकेले गुजारनी पड़ गई थी।

और अब मेरी बेटी भी मेरी वाली गलती करने जा रही है। नहीं। मैं उसे ऐसा हरगिज नहीं करने दूँगी। माधवी बुदबुदा उठी।

इसी निश्चय के साथ माधवी उठी और दो कप कॉफी बनाकर शिल्पी के रूम की तरफ चल दी।

सच, एक माँ अगर अपनी आन पर आ जाए तो अपने बच्चे को हर मुसीबत से बचा सकती है।

फिर चाहे बात उसके करियर की हो या ज़िन्दगी में आए किसी भी तुफान की।

माधवी ने उस रात अपनी बेटी को पति पत्नी के रिश्ते की गहराई की बात समझाई और उसे तलाक के निर्णय पर फिर से सोचने को कहा। पहले तो शिल्पी नाराज़ होती रही फिर इस शर्त पर मान गई कि इसके पहले वो रुद्राक्ष से बात करेगी।

फिर क्या था, माधवी ने फोन करके रुद्राक्ष को बुलाया। दोनों को बैठाकर सारी बातें सुनी फिर उन्हें अपनी जिंदगी के तपते रेगिस्तान की दास्तां सुनाई तो उसने शिल्पी और रुद्राक्ष की आँखों में एक दूसरे

से किये गए बातों के लिए पछतावा साफ झलक रहा था। माधवी के सामने ही दोनों ने एक दूसरे से माफ़ी माँगी और पति ने माधवी को आशस्वासन

दिया कि अब वो ऐसे नहीं लड़ेंगे।

अब जाकर आज की सुबह की चाय बहुत स्वाद बहुत अच्छा था। आखिर शिल्पी और रुद्राक्ष ने एक दूसरे की इच्छा का मान रखते हुए भावनाओं का मोल जो समझ लिया था।और आज माधवी के घर से दूसरी बार बेटी विदा हो रही थी। पर इस विदाई में माधवी की आँखों में आँसू की बजाए ख़ुशी झलक रही थी। क्यूँ ना हो आखिर उनकी बेटी का घर हमेशा के लिए बसने जा रहा था।


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