अधूरी हसरतें (पार्ट- १)
अधूरी हसरतें (पार्ट- १)
ये कहानी उन दो प्रेमियों की है जो जी जान से एक दूसरे को चाहते थे। न उम्र, न जात, न अमीरी
-गरीबी का पैमाना। उनकी मोहब्बत के तराजू में तो सिर्फ प्यार ही तोला जाता था। लैला - मजनू, शीरी - फरियाद, सस्सी- पुन्नु, हीर - रांझा से भी ऊपर था उनका प्यार। प्यार का पाठ तो मानो दोनों ने दुनिया में आने से पहले ही याद कर लिया था। तभी तो वो नीली आंखों वाली नीला ,दिनेश के दिल की धरती पर खुला आसमान बन कर छा गई कि उसने किसी और लड़की की तरफ आंख उठा कर नहीं देखा। उनकी पहली मुलाकात भी कुछ अजीब ढंग से हुई थी।
नीला इस गांव में कुछ दिन पहले आई थी उसके पिता जी की बदली यहां हुई थी। वह अभी दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी, अभी उसने गांव के स्कूल में दाखिला भी नहीं लिया था, सारा गांव उनके लिए नया था। घर के पिछवाड़े में आम और अमरूद के पेड़ लगे हुए थे। इन पेड़ों की डालियां साथ वाले बाग की ओर थीं।
दिनेश को गांव में रहना अच्छा लगता था। वह अपनी नानी के साथ रहता था, नानी अकेली थी, दोनों को एक दूसरे का सहारा था घर भी बहुत बड़ा था। नानी के फलों के बाग थे। दिनेश दसवीं कक्षा में था।
एक दिन दिनेश ने नीला को आम तोड़ते हुए देखा, आम की डाली ऊपर थी पर पक्के आमों से लदी थी, वह उछल - उछल कर आम तोड़ने की कोशिश कर रही थी। दिनेश ऊंचे कद का लड़का था, उसने कुछ आम तोड़ कर नीला को दे दिए। नीला के लिए वो अजनबी था। वह बिना बोले
आंखों ही आंखों से धन्यवाद दे कर घर की ओर चली गई। नीली आंखों वाली नीलापहली मुलाकात
में ही उसके दिल की घंटियां बजा गई। कुछ दिन बाद उसने नीला को अपने स्कूल में देखा। हाई क्लास के लड़के ,- लड़कियां एक ही क्लास में पढ़ाई करते थे । इस तरह साथ रहते दोनों में प्यार का पौधा पनपने लगा।
गांव में पढ़ाई करने के बाद दोनों ने एक ही शहर में रह कर पढ़ाई की। फर्क इतना था कि नीला ने लड़कियों के कॉलेज से पढ़ाई की। दोनों छुट्टियां बिताने गांव जाते थे। गांव में अभी भी उन्हें, बचपन की तरह पेड़ों से फल तोड़ना और बागों में घूमना अच्छा लगता था। गांव के पास की पहाड़ी पर एक मंदिर था। वहां हर साल जब मेला लगता तो आसपास के गांव के लोग वहां छोटी छोटी दुकानें लगाते थे। ढोल की ताल पर पहलवान अखाड़े में कुश्ती करते, झूला जब ऊपर से नीचे आता तो झूले पर झूलते बच्चों का शोर, कहीं गर्म - गर्म जलेबी और समोसों का आनंद उठाते लोग, रंग- बिरंगी चूड़ियों का मोल - तोल करतीं गांव की अल्हड़ और मासूम लड़कियां, गुब्बारों को लेकर हंसते मुस्कराते छोटे बच्चे कितना आनंद आता था उस मेले में। कुछ बूढ़े लोग इन दोनों को साथ देख कर सदा खुश रहने की दुआएं देते थे । और आपस में फुसफुसाते कि काश यह दोनों शादी कर लें । अपने बचपन की यादों को सदाबहार बनाए रखने के लिए इस मेले पर नीला और दिनेश जरूर गांव आते थे।
क्रमशः

