STORYMIRROR

ज़ख्म

ज़ख्म

1 min
757


वक़्त के दिये जख़्मों को अब तुम भर जाने दो

वो जो जा चुका है छोड़ कर, तुम भी उसे जाने दो।


ये जो कैद कर रखा है खुद को इस चारदीवारी में

खोल दो ये खिड़कियां, थोड़ी धूप को आने दो।


क्यूँ बाँध रखा है तुमने आँखों में सैलाबों को

जहर बन जायेंगें ये, इन्हें खुल कर बरस जाने दो।


माना कि रात भारी थी मगर सुबह तो सुनहरी है

सुबह की ठंडी ओस में तुम खुद को भीग जाने दो।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama