ये रास्ते …बेज़ुबान कहाँ
ये रास्ते …बेज़ुबान कहाँ
ये रास्ते ज़िंदगी के
बेज़ुबाँ है मगर …
दास्तान इनकी सुनाने को
बेताब है जहाँ …और बेसब्र
ये कहानी तो जानी सी है
सब निशानियाँ पहचानी सी हैं
माँ का दर्द है ये …
पापा की मेहरबानियाँ हैं ये
हाँ ये रास्तों का दर्द …
बेज़ुबान है मगर …
बेताब है जहाँ … और बेसब्र
जन्म देती है वो जब
एक माँ का ख़िताब पाती है
दिन रात फिर सब भूल के
एक खूबसूरत सा अपना ही उजाला बिखराती है …
हाँ पापा एक छोटा सा शब्द
गुंजा जाता है जब कानों में
दुनिया का हर बोझ भी फिर
काँटों की चुभन और फूलों की ख़ुशबू की तरह महका जाता है
पर रास्तों के जैसी है ये ज़िंदगी
एक दिन अपने आप को दोहराती है
वो उजाले वो ख़ुशियाँ …
शायद कुछ पल की कहानी है
माँ पापा की तरह ये राहें उनकी निशानी है
रुकती कहाँ इक जगह पे
फिर उन रास्तों को छोड़ कर
निकल जाती है अपनी राह बनाने
हाँ ये तेरी मेरी कहानी है …
यूँ ही रास्ते खड़े रह जाते हैं
माँ पापा की आँखो की तरह निहारते रहते हैं
फिर कब मिलेंगी राहें
जो अलग हो गई …
नयी मंज़िलो को पाने को
हाँ माँ पापा भी राहें ही तो है
रह जाते हैं वहीं..
और एक दिन हम यशवी …
उनके फूल ही तो हैं …
छोड़ आते हैं ख़ुशबू
छोड़ आते हैं…
फिर नयी राहें बन जाते हैं …
यूँ ज़िंदगी जीते चले जाते हैं
बेज़ुबान कहाँ ये राहें …सब कुछ गुनगुनाती हैं।
