ये बसंत भी अजीब है..!
ये बसंत भी अजीब है..!
सखी..!
अजीब है यह बसंत का आगम भी
कहीं कोई चेहरा दिखे खिला खिला
कहीं कोई मुरझा के हुआ पीला
घाव किसी के सिल गये तो
पीड़ा किसी की हरी हुई
कहीं खेत में खड़ी सरसों की फूली पीली
अरहर है कि छेड़ रहा राग बसंती
हरी मटर भी झूम झूम के हो रही नखरिलि
सच बोल रही हूँ सखी
ये बसंत है रंगी मिजाज़ी
कहीं खिल जाते चेहरे तो
कहीं कोई विरह की मारी।

