तुम सूरज सा बनना..!
तुम सूरज सा बनना..!
महज नाजुक कली नहीं
अपितु कैक्टस बनना
रंगीन तितलियाँ नहीं
अंदर तक दंश फैलाने
द्विरेफ सी टूट पड़ना उन पर
जो हाथ उठे तुम्हारी तरफ
हाँ..
उठे कोई नज़र जो तुम्हारी तरफ
या ..
जब भी कोई करना चाहे
दागदार आँचल तुम्हारा
बन जाना सूरज की तरह
भभकता हुआ आग का गोला
नहीं बनना तुम छुईमुई
जो मुरझा जाए छट से
किसी स्पर्श को पाकर
तुम्हारा चाँद पर पहुचना
या कि..
आधी आबादी का दिखावे का
हिस्सा बनना ही पर्याप्त नहीं
तुम्हें तो अभी और भी
जंग है जीतना
जाने कितनी बेड़ियों को तोड़ना
और जाने कितनी प्रथाओं को ध्वस्त
करना कितनों का सृजन
सच में स्वाहा और स्वधा बनना
लक्ष्मीबाई/ दुर्गा/ काली बन
कूदना है समर में,
जिससे तुम अनभिज्ञ हो।
नाजुक कली नहीं बनना है तुमको..
तुम्हें स्वयं रचना हैअपना संसार
लिखना है अपना भाग्य...!!
हाँ..
बेशक़ चाँद सा शीतल रहना
पर..
सूरज बनकर रहना
जिससे कोई नज़र कुदृष्टि ना डाल payer...!!
Shipra Pandey 'Jagriti'
