STORYMIRROR

Vikas Shahi

Tragedy

3  

Vikas Shahi

Tragedy

व्यथित अंतर्मन

व्यथित अंतर्मन

1 min
228

सहम जाता हूँ अक्सर

भयावह उस स्वपन पर

आधी रात डरकर

उठ जाता कम्पन पर


मेरी आहट मुझसे पूछती

हारा हुआ अधम कहता

हृदय घाव कुरेद जाता

स्वयं से ही हसद जाता


जीवन के कालचक्र में गुम गया

व्यथित अंतर्मन में घूम गया

समय से आघात जो पाया

दर्पण वो कभी भूल न पाया।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy