STORYMIRROR

Vikas Shahi

Abstract Classics

4  

Vikas Shahi

Abstract Classics

~स्वयं के अंदर ढूंढे मन निज~

~स्वयं के अंदर ढूंढे मन निज~

1 min
192

स्वयं के अंदर ढूंढे मन निज के

जैसे पात पियत जल पंकज के


प्यासा फंसे मध्य समंदर कहीं

करि खूब विनती प्रस्तर सम ही


चाहत की मुठी में रेत अड़े ऐसे

चीनी रोगी के हाथ में पेड़ा जैसे


बिन किस्मत जीत है ललचायी

उम्मीद गूंगा से बात को लगायी


छुई मुई के सम स्वप्न देख हरषे

लगे जेठ में काली घनघोर बरसे


दरिया पार हो कश्ती कागज के

स्वयं के अंदर ढूंढे मन निज के।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract