STORYMIRROR

अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

4  

अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

वो वक्त की बात थी यार..

वो वक्त की बात थी यार..

1 min
200

कितनी मासूमियत थी,

वो जब मेरी जिंदगी थी,

हर पल एक ही ख्याल था,

वो सदा खुश ही रहे सनम,


जिसकी खुशी में निहाल था,

वो वक्त की बात थी यार,

जब हवा भी रुख बदलती थी।


उसके करीब जब मैं होता था,

जिंदगी को नसीब समझता था।

आज से कल तक जो हुआ था,

वो प्यार का मदहोश नशा था,


जो हालात पर उतर गया कश्ती से,

वो कहां अपना हुआ दिल की बस्ती में।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy