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Vigyan Prakash

Romance

4  

Vigyan Prakash

Romance

वो लड़की

वो लड़की

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वो बागों में कलियाँ लाया करती थी,

लड़की अपना इश्क़ नुमाया करती थी।

हर जर्रे पे लिख डाला था नाम मेरा,

जाने कैसे इश्क़ जताया करती थी।


सामने रहता था उसके मैं लेकिन वो,

ख्वाबों में ही मुझको पाया करती थी।

जाने कैसे इश्क़ किया था उसने की,

मेरे हँसने पे रो जाया करती थी।


जाने कैसी निस्बत थी मुझसे उसको,

चेहरे पे चेहरा इक रख वो मिलती थी।

इस चेहरे पे आई ना मोहब्बत साफ कभी,

उस चेहरे से आहें जाया करती थी।


मैंने खुद को ना था कभी इतना जाना,

वो मुझको पन्ने दर पन्ने पढ़ जाया करती थी।

जाने किस फितरत की थी वो लड़की भी,

मुझ संग वो भी मैं हो जाया करती थी।


मुझको पाना मकसद ना रखा उसने,

वरना उसने मुझको पा ही लेना था।

वो लड़की क्या खुब मोहब्बत करती थी,

अपनी सांसें मुझपे जाया करती थी।


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