वक्त की मार : वक्त के साथ...
वक्त की मार : वक्त के साथ...
वक्त की दलील
वक्त आने पर ही मिलती है...
नासमझ बस खाली मकान देखकर
उसे ही अपना आशियाना समझ लेेेते हैं...
ये उनकी नासमझी है कि
वो अपने हाथ आए मोती को भी
कांंच समझ कर फेेंक दिया करते हैं ...
ये वक्त का दस्तावेज है जो हमेेंं
हमेशा याद रखना जरूरी है।
साथ मिलकर काम करनेे से
प्यार पलता है ।
नफरत तो वो आग है,
जो अपना-पराया कुछ नहीं देखता...
बस दिल की नज़दीकियों को
बेेेरहमी से जलाकर
खाक में मिला देता है।
इसीलिए हमें सोचसमझकर
बात करने की ज़रूरत है,
न कि मुँह खोलकर
जो भी आए
बक देना चाहिए,
क्योंकि लोग आपको
आपके कपड़े, चेहरे या
रुतबे से नहीं,
आपकी एक-एक बात से
परख लेते हैं !
ज़रा सोचसमझकर बोलिए...
और जो भी बोलिए,
शुुुभ-शुभ बोलिए...
सत्य वचन बोलिए...
झूूठ को परहेज़ कीजिए ।
परिवार की दहलीज़ पे
मंगलमय कदम रखा कीजिए...
मिलनसार बनिए...
प्रेम बरसाइए !!!
