विषय =कृष्ण सुदामा
विषय =कृष्ण सुदामा
मैं कृष्ण वो सुदामा सुनो हमारी गाथा,
मैं बहुत अमीर वो गरीबी की पराकाष्ठा,
मैं दूध, दही और माखन सेवन करने वाला,
जबकि ना बनता उसके घर में दो समय का खाना।।
कुछ अलग रिश्ता था हम दोनों के दरमियाँ,
दिल से दिल तक, वाला था हमारा याराना,
उसके घर उबले धान से मैं पेट भर लेता,
और उसे मेरे यहाँ उसे छप्पन भोग खिलाता।।
वक़्त के साथ बीच का फासला बढ़ता गया,
मैंने राजा बन शासन किया वो रंक बन गया,
मित्रता ऐसी कि कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा,
मित्रता की खुद्दारी का आज भी ज़माना दुहाई देता।
