विनायकी का सन्देश
विनायकी का सन्देश
संवेदनहीन,
तुम।
मैं,
जानती थी,
मुझे स्वयं की चिंता न थी,
मेरे गर्भ
में भूख से व्याकुल
तुमसे अनजान
मुझे कर रहा था परेशान,
खोज खाने की
उसके और स्वयं के
भूख मिटाने की,
तुम सबों के पास मैं आई,
सोचा, तुम ना होगे
इतने निर्दयी,
जबकि मुझे था ये ज्ञात,
तुम अपनों को जब,
मार डालते गर्भ में,
थोड़ा भी दया प्रेम
ना होता तुम्हारे पास,
पूरे करने अपने स्वार्थ,
क्या नहीं करते तुम?
मानव कहलाते केवल
नहीं होती तुम में कोई
मानवता,
फिर भी मैं
भूलकर गई,
तुमने एक बार ना सोचा,
पर मैं तुमसे ,
कुछ न कहूँगी,
कोई दोष भी न दूंगी,
इसलिए तो
मैं भी मचा सकती थी तांडव,
तुम्हारे सभ्य बस्ती में,
कुछ ना कहा,
गर्भ के बच्चे सहित,
स्वयं को प्रभु को अर्पित किया,
देव होंगे तो न्याय करेंगे,
तुमसे न आशा न तुम पे विश्वाश,
शायद ,तुम्हारी मरी संवेदना
मेरी मृत्यु से फिर जन्मे,
मानव मानवता को,
फिर शायद कभी समझे।
