विडंबना
विडंबना
देश की हालत देखकर मन उदास सा है
हर मंजर देखकर 1947 के पहले का
मंजर नजर है
हर जगह मौजूद हैं अपने को साबित करते
लोग
हर जुबां कहती वो सही है
मैं सही मैं सही मेरे सिवा कोई कहीं नहीं
मारकाट कर लहू लुहान दिखाते लोग
ये कैसी विडंबना कहीं बहुत आगे निकल
आए थे
आज हम कैसे फिर बहुत पीछे आ गए है
आज हम सब में कमज़ोरी बैठी है
पर खुद को सबसे ताकतवर समझ रहे
क्रांति हुई थी आज़ादी के लिए
आज हम फिर ग़ुलाम हो गए है
कैसे हम अब आज़ाद हो पाएंगे
मानसिकता की गुलामी से
