"उसके आने की दस्तक "
"उसके आने की दस्तक "
कई बार उसने आने की मुझे दस्तक, इस तरह सुनाई है,
कभी बन खिज़ा आया तो कभी बनके बहार छाया है।।
कभी दी है उसने दस्तक पत्तों की सरसराहट से,
कभी बन परिंदा बैठा उसी डाली पर जा छाया है।।
कभी बैठी हूँ जब उदास, बन हवा वो दस्तक देता है,
हवा बन वो मेरी कानों की बालियों से, खेल कर लौट जाता है।।
देखती हूं पलट कर जब, तो भीनी सी खुशबू छोड़ जाता है,
बहती हवा सा ना जाने फ़िर किस ओर वो मुड़ जाता है।।
कभी पलटू जो पन्नें मैं, तो अक्षरों में दस्तक उसकी होती है,
खिलखिलाती हूं कभी पढ़ कर, तो कभी सिसकने लगते है।।
उन शब्दों के तानों बानों में, हाल वो मेरा पूछ बैठता है,
समझकर प्रेम पत्र उसके, सीने से लगा कर के झूम उठते हैं।।
कभी दस्तक मुझे उसकी, कानों से सुनाई तो आंखों से दिखाई देती है,
लगाती दौड़ मैं घर से दर तक सब भूल कर भागी आती हूं।।
खड़ी मैं इंतजार में उसकी दस्तक के, घंटों वहीं बिताती हूँ,
यकीन है मुझे पक्का, हार कर एक दिन वो दस्तक अपनी सुनाएगा।।

