उसका प्यार
उसका प्यार
मैं सुबह सवेरे उठकर बिस्तर छोड़ उमंग से जगता था
सब जरूरी काम छोड़ बस उसकी ताक में रहता था
वह भी छुप छुपा कर सब काम छोड़ उस गली आ जाती थी
चौखट खोलता कोई देख न ले इसलिए थोड़ा घबराती थी
मिलते ही बस कहती थी बस हो गया अब चलते हैं
प्यार व्यार के चक्कर में कहीं कूट न जाए हम डरते हैं
तुम तो हो अल्हड़ प्रेमी फर्क तुम्हें ख़ाक पड़ता हैं
हम हैं एक भारतीय लड़की समाज से हमें डर लगता हैं ।
उसकी बातें सुनकर बस मैं यह कहता था -
ओ मेरी प्रिये तुम बेकार की चिंता करती हो
हम हैं घर से बहुत दूर बेकार समाज से डरती हो
मेरी बातें सुन वह देख मुझे बस हँसती थी
गाल पर एक प्यारा चाटा मार अक्षय कुमार मुझे कहती थी
उसकी बातें सुन मैं थोड़ा चौड़ा सा हो जाता था
जैसे ही कुछ पास आता वैसे ही कहीं खो जाता था !
भोर के इस पहर में चाँद-सा हो जाता था
सभी कलंक का डर किसी कोने में छोड़ जाता था
वह कहती थी अब छोड़ो जाने भी दो कोई हमें देख रहा
ना जाने अजीब सा डर सीने को झंझोर रहा
मैं कहता था कोई नहीं है बेकार ही तुम डर रही
बिन आफत के ही आफत का सोच तुम चौंक रही
वह कहती थी तुम पागल हो कुछ ना समझोगे
देख लेना एक रोज किसी दबंग के हाथों निपटोगे !
उसकी बातें सुन कर थोड़ा मैं हँस पड़ता था
उसे क्या बताऊं मैं खुद वाराणसी का लड़का था
ठंडाई पीना भांग खाना भस्म लगाना हमारी फिदरत थी
महाकाल के अस्सी घाट का दर्शन रोज की आदत थी
मैं बोला प्रिय तुम उसकी चिंता अब छोड़ो
प्रेम करो बस इस पल में ही खुद को झोंको ।
प्यार व्यार सब होने पर न जाने वह क्या कह गई
मुझे ब्राह्मण बतलाकर खुद को यादव कह गई
रोकर बोली कब तक ऐसे छुप छुपा हम मिलेंगे
हॉस्टल के इस प्रांगण में ख़तरे संग हम खेलेंगे
हमारा मिलन संभव नहीं छोड़ों इश्क विश्क सब
अपने कमरे की ओर निकल, भूल जाओ अब किस्से सब ।
उसकी बातें सुन मैं उस पल अंदर ही अंदर टूट गया था
जाति प्रथा के मकड़जाल से अंदर ही अंदर ऊब गया था
मैं बोला तू रुक अभी मैं इसका उपचार करूं
इस बीमारी के लिए औषधि का प्रबंध करूं
तो क्या था,
अपनी उंगली काट मैंने मांग उसकी भर डाली
कृष्ण कुल की कन्या संग विवाह अपनी कर डाली ।
उस रोज जितना खुश थी अंदर से वह उतना सहमी
बाबा, माँ, ताऊ के डर से थोड़ा अपने में सिमटी
पर बोली मैं खुश बहुत हूं आज
मांग की सिंदूर रेखा तुम बने हो आज !
दो माह बाद जब छुट्टियां कॉलेज की हुई
मेरे होठों को चूम "आई लव यू " वह कह गई
मिलने का वक्त हमें एक माह कह गई
पर उसके घर जाने के बाद भी फ़ोन पर हम साथ थे
रोज शाम सवेरे दिल के गली में मिल कर हम पास थे !
लेकिन एक रोज हमारी बात न हो पायीं
फ़ोन हमारी न उसके फ़ोन से मिल पायीं
यह सिलसिला कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा
मैं महाकाल शिव सा थोड़ा चिन्तित होता रहा
अंत में टांडव करना मात्र एक सहारा रहा
मैं रूद्र रूप धारण किए मिलने निकल गया वहां
जहां मेरी इश्क़ रहती थी किसी चांद सा . .
पर जब गया कुछ दृश्य अज़ब दिखे मुझे
मेरी इश्क़ की राख़ गंगा में विलिन हो रहे
सब ख़त्म था राख़ बन गयी थी हमारी प्रेम की
भस्म हो गया था सब किस्से हमारी इश्क़ की !

