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Mayank Kumar 'Singh'

Abstract Romance


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Mayank Kumar 'Singh'

Abstract Romance


मैं भीग रहा हूँ

मैं भीग रहा हूँ

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मैं भीग रहा हूँ तन-मन से

तेरे हर क़ाबिल हलचल से

मैं मन के मोह से व्याकुल हूं

किसी कुरुक्षेत्र के अर्जुन सा

मेरे अंदर तू है, या ख़ाक हुई


जो थोड़ा-थोड़ा सूरज दिखता

मैं व्यथित हूं उस अंबर सा

जो मेरा चाँद न दिखा सका !

मैं भीग रहा हूँ तन-मन से

तेरे हर क़ाबिल हलचल से !


तू है किसी तस्वीर में कैद अभी

ना बोलती है ना कुछ सुनती हैं

कल जब भी तुझको देखा था

आंखें तेरी बातें कुछ गढ़ती हैं !

मैं भीग रहा हूँ तन-मन से

तेरे हर क़ाबिल हलचल से !


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