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Goldi Mishra

Tragedy Classics Inspirational

4  

Goldi Mishra

Tragedy Classics Inspirational

उन्मुक्त

उन्मुक्त

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4

काश हर परिंदे को आज़ादी मिलती,

पिंजरे को तोड़ उड़ जाने की राह दिखती,

इस आज़ादी में थोड़ी तो आज़ादी होती,

काश आज़ादी की परिभाषा

मर्द और औरत दोनों ने लिखी होती,


कागज़ दस्तावेज़ कहे मिली है तुम्हे आज़ादी,

पूंछे घूंघट की आड़ से नारी कहा गई आज़ादी,

मेरी तो आज़ादी तय करता ये समाज,

पुरुषों के इस शोर में मौन हुई नारी आज,


लहराता तिरंगा क्या ना पूछेगा नारी को कितनी मिली आज़ादी,

अपने सपनों को जब उसने छुना चाहा कुचल दी गई नारी,

सुनकर चीख निर्भया की कापी तो होंगी मां भारती,

उन्मुक्त गगन में घायल पंछी थी नारी,


पुरुषों में काश थोड़ी सी नारी होती,

फिर नारी के हिस्से बेड़ियां ना होती,

फिर कोई नारी अंधेरे में ना होती,

ऊंचाइयों के शिखर पर पुरुष के साथ नारी भी होती,

बिना किसी भय और पीड़ा के काश आज़ादी नारी की भी होती।


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