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Rajit ram Ranjan

Abstract

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Rajit ram Ranjan

Abstract

उजाला औऱ अंधेरा..

उजाला औऱ अंधेरा..

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उजालों सा ही तो हैं,

उसका रूप.

क्यूँ लगता हैं लोगो को,

कुरूप.

बस इसमें चीजे,

दिखती

हैं,

आँखों

को,

औऱ उसमें

नहीं.

बदलता कुछ भी

नहीं,

सब वैसा ही

रहता

हैं.

बस 

लोग इसमें(उजाले)ख़ुशी

जाहिर करते

हैं,

औऱ उसमें(अंधेरा)

दुःख.

दोनों एक सिक्के के,

दो पहलू

हैं.

बस आँखों का

धोखा

हैं.

दोनों एक

ही हैं,

बस प्रारूप

अलग

हैं,

ज़ब एक आएगा तो,

दूजे को जाना ही

पड़ता

हैं.

दोनों को सारी उम्र

एक दूजे के

बिना,

जीना

हैं...!



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