उदगार प्रतीक्षा
उदगार प्रतीक्षा
तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे॥
विवाहे शिव में जब तुम गये थे॥
कुछ मन को छुआ तुमने
उस रात
जब और सब थे, मस्त लीला श्रवण में ॥
कुछ ऐसा हुआ था भास
तुम्हारी आँखों के अपलक
मौन से, वो भी लगीं कुछ ढूँढती॥
.. ऐसा मेरा मन बोला था॥
शायद ये मेरा
जवान होते का पहिला साक्षात्कार भाव ही रहा होगा॥
एक बार फिर झोंका आया
जब कुरमुराहट सुनी मैंने
मेरे और तुम्हारे लिये॥
बड़ों के बीच शादी के लिये
… ……लेकिन शायद
रिश्तों का जाल आड़े आया॥
फिर एक बार
मिले तुम अपने परिवार के साथ॥
अब भी कहीं दायरे में हो
मिलने जुलने के॥
फिर भी कभी हुए
बचपन के उस लगाव को
तुमसे कहूँ ॥
ऐसा अनहोनी भी नहीं ये कहना
और तुम्हारा सुनना।
अपनी पत्नी और तुम्हारे पति के साथ॥
कुछ सब हंस लेंगे॥
जीवन में ये पल
आते हैं
जाते हैं
अनकहे रह जाते हैं
….. वो उस पार मिलने कहने की व्यथा में
काल विलीन तक हो जाते है॥

