Win cash rewards worth Rs.45,000. Participate in "A Writing Contest with a TWIST".
Win cash rewards worth Rs.45,000. Participate in "A Writing Contest with a TWIST".

Ravikant Raut

Drama


2  

Ravikant Raut

Drama


तज़ुर्बा

तज़ुर्बा

1 min 1.4K 1 min 1.4K

माथे पर किसी के,

उभरती शिक़न देख कर,

कभी किसी के चेहरे की,

बदलती रंगत देख कर।


कौन, कब,

उखड़ने वाला है हत्थे से,

पहले से भाँप जाता हूँ,

कि एकाएक चुप लगा जाता हूँ।


उम्र भर कदमताल करती,

नाक़ामियों और,

रास्ते की ठोकरों ने,

इतना तो तज़ुर्बा,

दे ही दिया है मुझे।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Ravikant Raut

Similar hindi poem from Drama