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Yuvraj Gupta

Romance

4  

Yuvraj Gupta

Romance

तुमसे... नहीं होना था

तुमसे... नहीं होना था

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ख़्वाबों को... हक़ीक़त नहीं होना था 

कभी कुछ पल उदासी में सही 

जिंदगी को... इसी रफ़्तार में होना था 


क्या मिला तुझे हासिल कर के मुझे 

जब किस्मत में लिखा तुझे खोना था 

मुसाफ़िर मैं सफर में अकेला सही 

दिल में मंज़िल की उम्मीद का कोना था 


कुछ पल उदासी में सही 

जिंदगी को... इसी रफ़्तार में होना था 


सुकून था रातों में 

पलकों पर ख़्वाब बेवजह थे 

क्या ही सोचा होगा जाते वक़्त तुमने 

लेकर समंदर आँखों में 

तनहा तो अब हर रात मुझे सोना था 


कैसे दूँ मैं जवाब सबको 

सबको बेचैनी अपनी बताऊँ कैसे 

क्या ये सब नहीं जानते अंजाम पहली मोहब्बत का 

तो समझ लीजिये यूँ कि, हुआ वही जो होना था 


बस... ख़्वाबों को हक़ीक़त नहीं होना था 


काश... रोक लिया होता खुद को उस दिन 

जब पहली बार तुमसे नज़रें मिलीं थीं 

तेज़ थी रफ़्तार धड़कनों की

साँसों में अजब सी खलबली थी 


इतना मुश्किल नहीं था 

खुद को, उस मंजर में गिरने से रोकना 

जितना मुश्किल आज लगता है 

खुद को खुद में खोजना 



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