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डॉ. प्रदीप कुमार

Romance

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डॉ. प्रदीप कुमार

Romance

तुमने सुना क्यों नहीं?

तुमने सुना क्यों नहीं?

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मैंने जब आवाज़ दी थी, 

तुम्हें ठहर जाना था, 

मेरे कदम जब लड़खड़ाए थे, 

तुम्हें संभल जाना था।

मैंने जब खुशबू की चाह की थी,

तुम्हें महक जाना था, 

अपनी मनमानी के चक्कर में, 

ये मौका नहीं गंवाना था।

तुमने मुझे पहचाना नहीं था! 

क्या वो कोई बहाना था?

या यूं ही बहाने से दूर रहकर, 

मेरे दिल में उतर जाना था?

तुम्हारे घर के दायरे में ही, 

मेरा उस वक्त ठिकाना था, 

मेरी नज़रें तुम पर थीं, 

मेरे पीछे सारा ज़माना था।

नाम तुम्हारा रट-रट कर, 

मुझे कबीर बन जाना था, 

पत्थर पे लिखा मेरा नाम मिटाकर, 

यूं मुझको नहीं भुलाना था।

अपने उसूलों को ताक पर रखकर, 

मुझको गले लगाना था, 

मेरी सारी कमियों को अनदेखा कर, 

तुम्हें मुझे अपनाना था।


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