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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Tragedy

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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Tragedy

तुम्हें जवाब देना होगा..?

तुम्हें जवाब देना होगा..?

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इन दरकते पहाड़ों और

बंजर होते खेतों का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


बांधों में सिसकती नदियों का

सूखते गाङ गदेरों का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


इन खंडहर होते मकानों का

बर्बाद होते गांवों का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


जो छला है भावनाओं को 

कुचला है आत्माओं को 

उनका हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


बेरोजगारों की लाचारी का 

उनकी रोज की रोटी का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


कमर किसानों की टूट गई

खेती भी उनसे रूठ गई 

उनके एक एक पसीने का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


आमदनी चवन्नी हो गई

मंहगाई डायन हो गई 

सुने पड़े बाजारों का

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


दूध के लिए बिलबिलाते बच्चों का

सकपकाई गृहणी के चूल्हे का

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल बुरा 

शमशान में भी अब लगा पहरा 

लोगों के दुःख दर्द का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


चौपट कारोबार हो गया

रुपया दशकों से लाचार है पड़ा

इस लाचारगी का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


सुनी आंखों में डूबते सपनों का

पहाड़ से पलायन किए अपनों का

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


उम्मीदों को तरसते राहों का 

अब गांव पहुंचती सड़कों का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..? 


विकास के झूठे वादों का 

हर छोटे बड़े घोटालों का

अपनी बदनीयत नाकामियों का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..? 


आत्मदाह करते बच्चों का

महंगी होती शिक्षा का 

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


मांओं के छलकते आंसुओं का 

इंतजार में बैठे बाप का

हिसाब देना होगा

तुम्हें जवाब देना होगा..?


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