STORYMIRROR

Tritrishna Ghosh

Romance

1  

Tritrishna Ghosh

Romance

तुम और बसंत

तुम और बसंत

1 min
116

उस रोज़ कुछ अजीब सी थी

दिल में हज़ार एक कश्मकश सी थी

हम कुछ सोच के चल दिए घर से

आँखों में तुम्हारी एक झलक सी थी

मौसम कुछ नाज़ुक सी थी

हमारे दिल में चाहत की पतंग सी थी

प्यार का महीना था, बसंत की ख्वाइश सी थी

ख्वाबों के आँगन में, तुम्हारी नाम सी थी

आँखें बंद करके सांस में तुम्हारी खुशबु सी थी

पीले गुलाब भी थे और तुम्हारी शिकायतें भी थी

उस रोज़ कुछ अजीब सी थी

नये पत्तों का बहार भी था

और साथ तेरे होंठ की हसीं भी थी |



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance