STORYMIRROR

Tritrishna Ghosh

Abstract

3  

Tritrishna Ghosh

Abstract

प्यारे बसंत

प्यारे बसंत

1 min
187

उस दिन छज्जे पर लेटे हुए

हलकी सी आंख लग गयी

अचानक तुम दिखे सामने


तुम्हारे उस दोपहर सी

मुँह पर बसंत सी हँसी

प्यार का आग़ाज़ कर रही थी

ज़ोर ज़ोर से,


मैंने महसूस किया

उस ठन्डे से दिल को

जो मौसम के साथ

कभी कब्र बदल जाता था


और मुस्कुरा उठी यह सोचकर

अच्छा हुआ तुम और बसंत, दोनों ही,

अब अनजान हो चुके हो मेरे लिए।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract