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BINDESH KUMAR JHA

Tragedy

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BINDESH KUMAR JHA

Tragedy

टूटा हुआ इंसान

टूटा हुआ इंसान

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खाई चोट अनेक इस शील ने 

फिर भी स्वयं को बनाया है 

डोलता नहीं एक पग भी

 इतना समर्थ इसने पाया है।


मानव तो क्षोभ भरता है

एक ही चोट में ,

बैठ जाता है ,कहीं पतझड़ के साँझ  

इसी व्यथा अफसोस में।


आशा के हार बनता है

सपनों का वस्त्र बुनता है 

और मात्र एक ही चोट में 

व्यथा का तरु बनता है।


नर हो क्यों खेद

किसी के छल से ,

टूटते हृदय जोड़ लो 

फिर आत्मविश्वास के बल से।


कोटि भँवरे आए हैं 

चले जाते फूल को छोड़कर 

फूल कब दुखी हुआ?

कोटि राही जाते हुए उसे तोड़कर


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