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BINDESH KUMAR JHA

Tragedy

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BINDESH KUMAR JHA

Tragedy

उलझन

उलझन

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हैं हम खड़े जहां 

लाखों के भीड़ में

हैं हम तब भी एकांत

इस तरकश के तीर में।


युग तो कोलाहल कर रहा

हम यदि मौन हैं 

स्वयं को श्रेष्ठ मानते थे

जबकि हम गौण थे।


हम तो भ्रम में है 

पक्ष -विपक्ष में व्यस्त हैं

अपनी धुन में मानव 

स्वयं ही मस्त है।


ठोकर यदि जाता है लग

पल भर के लिए वही रहती है 

फिर मानव चलता उसी पथ पर 

जहां स्वार्थी दुनिया उसे कहती है।


कौन हमारा है 

हम तो इसी में उलझे हैं 

जीवन समाप्त होने पर 

अंत में हम जगदीश कहते हैं।


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