तन्हाई और मैं
तन्हाई और मैं
तन्हाई जब भी बुलाती है
मैं उसकी तरफ दौड़ी चली जाती हूँ
कुछ वो कहती और मैं सुनती रहती हूँ
कुछ मैं भी उसे कहती रहती हूँ और वो भी सुनती है
इसीलिए जब वो बुलाती है मैं उसके पास दौड़ चली जाती हूँ ।
कभी कभी तन्हाई मेरे लिये
यादों के तोहफे ले कर आती है
जब उन यादों को मुझे देती है
उन यादों में मैं खो जाती हूँ अपनी सुध-बुध खो बैठती हूँ
उन यादों में गुम होकर कभी हंसती हूँ कभी रो पडती हूँ
और तन्हाई बस चुप चाप मुझे देखती रहती है
और तन्हाई और मैं ना जाने किन ख्यालों में खो जाते हैं ।
तन्हाई के साथ मेरा एक अजीब सा नाता है
ना वो मुझे छोड़कर रह पाती है
ना तो मैं उसे छोड़कर रह पाती हूँ
उसके साथ देर तक बैठी रहती हूँ
कुछ दर्द के नगमे उसे सुनाती हूँ
कुछ अपने खोए हुए प्यार की बातें सुनाती हूँ
वो सुहानी सी प्यार की मुलाकातें वो प्यार के वादे
मैं और मेरे प्यार के किस्से सब कुछ उसे सुनाती हूँ
और बस ऐसे ही तन्हाई की वो सूनी सी कितनी रातें
उसके साथ मैं गुजारती हूँ
इसीलिए तन्हाई मुझे जब भी बुलाती है
मैं उसके पास दौड़ चली जाती हूँ।
