ताबूत - - दो शब्द
ताबूत - - दो शब्द
जिन्दगी में
श्वासों की रिदम्
जीवन के मूल्य बदल देती है-
एक एक श्वास
जीवन के धड़कनों को
अहसासों की आवृत्ति देती है--
और
वही श्वास
जब रूक कर अपने अस्तित्व का
अहसास कराती है-
कि हे जीव जंतु तुम्हारा इतराना
गर्व में खो जाना और अपने आप को खुदा समझने की भूल करना,
मेरे बिना कुछ नहीं है मूल्य बताती है-
यह
मन न जाने
कितना नाच नचाता है-
और अधिक पाने की चाहत में
शरीर को
बेदर्दी से खपाता है-
ताबूत
दो तरह के होते हैं
एक जो आत्मा से विलग अस्तित्व को
सुपुर्द - ए-खाक करने के लिये ले जाता है कब्र तक--
दूसरा होता कुंठित विचारों का ताबूत
जो जीते जी सीमा रेखा में
बांध देता व्यक्ति और व्यक्तित्व को
उसके आखिरी सब्र तक--
शरीर कितना भी यत्न कर ले
एक दिन यूं पड़ा होगा
खोकर अपनी अस्तित्व बेजान सा
बिखर जायेगा टुकड़ों में
रह न पायेगा साबूत-
तुम्हें तुम्हारी अंतिम यात्रा का
एक अवलम्ब बन कर मिट्टी में मिलाने से पहले अपने आगोश लेकर
तुम्हारी महानता के अहंकार को तोड़ता
ताबूत -
