स्वतंत्रता का अनजाना स्वाद
स्वतंत्रता का अनजाना स्वाद
सदियों से....
तुम्हारी सोच के
पाषाण से
जकड़ी थी
और....
उसमें जकड़ना
मेरी आदत सी
बन गई थी
अब....
टूटी है मेरी तंद्रा
जो कुंभकरण सी
हो गई थी
अपना....
सब कुछ
यहाॅं तक की
नाम भी भूल गई थी
लेकिन....
अब जागी हूॅं
चैतन्य हो
पूर्ण रूप से
मैने....
चुन ली है
अपनी
जिजीविषा
कोई नही....
मुझ पर थोपेगा
खुद का
विचार/अधिकार
आखिरकार....
मैं भी चखूंगीं
स्वतंत्रता का
अनजाना स्वाद
ना जाने....
कहां से
भर गई है मुझमें
अपार शक्ति
अब मैं....
अपनी शक्ति से
पल में चूर - चूर
कर दूंगीं शिला
जानती हूॅं....
नही हूॅं मैं
सतयुग की
अहिल्या
मैं हूॅं....
कलियुगी शक्ति
स्वाभिमान से भरी
नही हूॅं नारी आम
क्योंकि....
जानती हूॅं नहीं आयेंगें
इस युग मे मुक्त करने
मुझे प्रभु श्री राम।
