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Kumar Vikrant

Romance Tragedy

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Kumar Vikrant

Romance Tragedy

सवाल

सवाल

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कैसे हो?

मुद्द्त बाद 

पूछा गया 

तुम्हारा यह सवाल 

अजीब है 

मुद्द्त पहले जब 

तुमने बेरुखी के साथ 

किनारा किया था मुझसे 

तब इस सवाल 

के कुछ मायने हो सकते थे 

क्योंकि 

तब मैं और मेरा वजूद 

बिखर रहे थे 

तुम्हारे बिना जीने की 

जद्दोजहद में उलझा था मैं 

तब यह सवाल 

तुमने नहीं पूछा 

पूछ लेते तो 

तेरे बिना जीना 

कुछ सहज हो जाता 

मेरे एक हिस्सा 

जो तेरे साथ था 

फिर से मेरा हो जाता 

जाते-जाते तुमने 

अलविदा भी न कहा था 

कह देते तो 

मुद्द्त तक 

तेरे वापिस आने की राह न तकता 

अब तो मुद्द्त हुई 

खुद को संभाले हुए 

मेरे बिखरते वजूद को समेटे हुए 

अब तेरे होने न होने से 

कोई फर्क नहीं पड़ता 

जिंदगी गुजरनी थी 

गुजर ही रही है 

कैसे हो?

मुद्द्त बाद तेरा ये सवाल 

अजीब है 

जवाब तुझे पता होना चाहिए था 

क्योकि मुझसे बिछड़कर 

अगर तू खुश थी 

तो मैं ही गमजदा कब तक रहता 

अगर तू गमजदा थी 

तो मैं खुश कैसे रहता 

मुद्द्त हुई तुझसे बिछ्ड़े हुए 

न तुझे मेरी परवाह 

न मुझे तेरी फ़िक्र 

फिर ये अजीब सा सवाल 

तेरे मेरे बीच कैसा?


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