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Prashant Subhashchandra Salunke

Drama Classics Fantasy

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Prashant Subhashchandra Salunke

Drama Classics Fantasy

सुदामा (क्या इतिहास दोहराएगा?)

सुदामा (क्या इतिहास दोहराएगा?)

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एक गरीब ब्राम्हण कृष्णलीला के बारे में बता रहा था। सहसा सुदामा की बात आई और उसके मन में विचार आया की वो भी गरीब है और उसका भी एक मित्र स्कुल में था जिसका नाम किसन था जो बड़ा श्रीमत था! संजोग से उसका नाम भी सुदामा था! उसने सोचा क्यों न इतिहास दोहराया जाए क्योंन कुछ सूखे पौवे लेकर किसन शेठ के घर जाए और पौराणिक कथाके सुदामा जैसा धनवान बने! ये सोच वह अपने धनिक मित्र के घर सूखे पौवे लेकर पहुँचा द्वार पर चोकीदारने उसे रोका तो वो बड़े तेवर से बोला अपने किसन शेठ से बोल उसका मित्र सुदामा आया है

अब हुआयुं की किसन बड़ा अंधश्रद्धालु था उसने सुबह वर्तमानपत्र में पढ़ा था की अगर तेरे दरवाज़े पे कोई ब्रम्हाण अचानक आ जाए तो बड़ा धन लाभ होगाजैसे चोकीदारने सुदामा की बात की वो दौड़ा चला गया उसे डर था कही वो लौट न जाए सुदामाने अपने मित्र को दौड़ते आता देखा तो खुश हो गया उसने मित्र के पैरो में देखा वो खुले पैर था उसकी ख़ुशी दोगुना हो गई

उसे लगा यार सचमुच इतिहास दोहराया जा रहा है

किसन शेठ बड़े सम्मान से उसे अपने बंगले में ले गया। ब्राम्हण को खुश रखने से लाभ होगा इस सोच से उन्होंने एक थाली में सुगंधित पानी मंगवाया और उस पानी से उनके पैर धोये, अपने कुरते के कपडे से उनके पैर साफ किए।

सुदामाने आँखे मूंद ली और सोचा "सचमुच ये तो इतिहास दोहराया जा रहा है" और इस सोच से सुदामा मुस्कुरा उठा।

सुदामा को मुस्कुराता देख किसन शेठने सोचा की उसकी भक्ति से ब्राम्हण खुश हुआ है अब बस अपनी तो निकल पड़ी! अब सुदामाने सोचा की पौवे दे दू ताकि जल्द से जल्द लाभ हो। फिर सोचा सुदामा ने शरमाते हुए पौवे आख़िर में दिए थे, इसलिए में भी आखिर में ही पौवे दूंगा! भोजन का समय हुआ सुदामा खाने बेठा। हर किस्म के व्यंजन से थाल भरा था। सुदामाने पनीर टिक्का बहोत खाया।

अब उसे नींद आने लगी

उसके लिए मखमल का आसन लगवाया गया

सुदामा सोने जा ही रहा था की शेठ ने पूछा " सुदामा मेरे लिए कुछ भेट नहीं लाया" ये प्रश्न किसन शेठ ने इसलिए पूछा था क्योंकि उन दिनों ब्राम्हण या साधू किसी के घर जाए तो कुछ न कुछ भेट माने एकमुखी रुद्राक्ष या शिवलिंग एसा देते जिसे पवित्र माना जाता और घर के मंदिर में उसे रख उसकी पूजा होती।

सुदामा ख़ुशी से उछल पड़ा और सोचने लगा अरे यार सचमुच ये तो इतिहास दोहराया जा रहा है

सुदामा ने शरमाते हुए पोटली वाला अपना हाथ जानबुझ कर पीछे किया, जैसे कुछ छुपा रहा हो. यह देख किसन सेठ को कुतूहल हुआ. उसने पुछा “क्या छुपा रहे हो सुदामा?’ इस पर सुदामा ने कहा “याद है किसन शेठ तुम्हे बचपन में स्कूल में लाए मेरे सुखे पौवे बहोत अच्छे लगते थे? तुम और मुरली मेरे पौवे के लिए बहोत लडाई झगडा करते थे. एक दिन तो तुम मेरे हाथो से मेरी पौवे की पोटली लेकर भागे भी थे और मेरे पौवो के लिए तुम्हारे पीछे मुरली भागा था! याद है? मेरे पौवेके लिए तुम तुम्हारे पकवान वाले टिफिन मुझे देते थे.

किसन शेठ ने याद करने की कोशिश की पर उन्हे इतना कुछ याद नही आ रहा था!

किसन शेठने फिर भी ब्राम्हण देवताः की खुशी के लिए झूठमूठ कहा : हा हा याद है, पर तुम अभी क्या लाएहो?

सुदामाने पोटली आगे कर कहा : "ये तुम्हारी पसंद के सुखे पौवे"

किसन शेठ ने ये सुन के मन में दो चार गालियां दी पर चुकी पेपर के निर्देश अनुसार ब्राम्हण के दिल को ठेस पहुँचाना नही था इसलिये उन्होने उस पोटली के पौवो को चुपचाप खाने की शुरुआत की

सुदामा के पौवे खाते हुए किसन शेठ ने सहज पूछा "सुदामा तू अब कहा रहता है?"

बस इसी चीज का तो सुदामा को इंतजार था की पौवे खाते खाते वो उसकी तकलीफे पूछे और कहाँनी में जैसे हुआ वैसे उसकी भी तकदीर बदल जाए!

सुदामा बोला "यही से दूर मेरी एक झोपड़ी है में उसी में रहेता हूं

किसन शेठ को पौवे में मजा नहीं आया उन्होंने पौवे बाजु पर रख पानी पीते हुए कहा “बाकि सब ठीक ठाक है न?”

पौवे किसन सेठ नहीं खाएगा तो उसकी किस्मत कैसे बदलेगी? इसी सोच में सुदामा था।

किसन सेठ ने फिर पूछा "सब कुशल मंगल है न सुदामा?

सुदामा बोला "कहा से ठीक होऊंगा मित्र तुम मेरे पौवे तो खा नहीं रहे?"

किसन सेठ को मजबूरन पौवे का निवाला लेना पड़ा

सुदामा उसकी एक एक तकलीफ उसे बताता गया और उसकी तकलीफे सुनते सुनते किसन शेठ भी पौवे बिना तकलीफ के खा गया! पौवे ख़त्म हो गये पर सुदामा की तकलीफे बाकि थी! सुदामाने मन में सोचा ज्यादा पौवे होते तो अच्छा होता और किसन शेठने पानी पीते सोचा "ये पौवे कम नहीं ला सकता था!"

किसन शेठ ने उसकी तकलीफे सुन पूछा " सुदामा क्या तुम्हे कोई मदद चाहिए?"

सुदामा नम्र स्वर में बोला " ना मित्र तुमने पौवे खा लिए मेरी सब तकलीफे दूर हो गई"

किसन सेठ को उसकी बात समझ में नहीं आई

अब सुदामा को घर लौटकर अपनी बदली तक़दीर को देखने की जल्दी थी

सो वो फटाफट घर जाने के लिए तैयार हुआ?

जब वो घर जाने के लिए निकल ही रहा था की।


किसन शेठने उसे आवाज दी " सुदामा रुको जरा..." सुदामा रुक गया

किसन शेठने उसके पास जाकर कहा याद है सुदामा तुझे मेरे टिफ़िन की सब्जी बहोत अच्छी लगती। और उस लिए तू प्यार से मुझे उसी नाम से पुकारता

सुदामा को याद आया की स्कुल में वे उसे कददू कददू कहकर चिढाते थे। यह याद कर सुदामा तुरंत बोला

"हा दोस्त, तूजे हम सब कददू कददू कहकर चिढ़ा.... मेरा मतलब पुकारते थे।पर अब घर जल्द लौटना है मित्र मुझे कददू की सब्जी नहीं खानी"

इसपर किसन शेठ हंस कर बोला "ना दोस्त में तो तुझे मेरे बाग़ का वो कददू ही भेट दे रहा हु। और पास खड़ी अपनी बीवी को धीरे से बोला "इसके सूखे पौवे ने पुरे पेट में गड़बड़ करदी अब उठाके ले जाए पुरे रस्ते ये कददू (दोनों मन में हस पड़े)

नौकर एक बड़ा सा कददू ला कर सुदामा के हाथो में थमा दिया!

कददू बहोत बड़ा था और सुदामा से संभाला नहीं जा रहा था। यह देख किसनशेठ की धर्म पत्नीं बोली "भैया कददू उठाया न जा रहा हो तो यही रख दो शाम को हम कुछ बना लेंगे।" फोगट में कददू सुदामा ले जा रहा था ये देख उसकी धर्म पत्नी जल भुन रही थी।

सुदामा ने हंस कर और किसन शेठ की और देख कहा "दीदी आपके पास तो कददू है। मेरा मतलब इतने सारे बाग़ में है। और जरा तिरछी नजरो से किसन शेठ को घूरकर कहा "इस कददू को में नहीं छोडूंगा!यह मेरे दोस्तने दी हुई भेट है। उसका प्यार है!"

किसन शेठने व्यंग में कहा "रास्ते में मेरे प्यार से ऊबकर उसे ठुकरा मत देना!"

तभी एकनौकर दौड़ता भागता आया और बोला "शेठ बरसो से जो जमीन का केस कोर्ट में अटका हुवा था उसका आज फैसला आ गया है।"

शेठने पूछा "क्या फैसला आया है?"

नौकर खुशी से चिल्लाया "हम केस जीत गए!"

किसन शेठ ने दो हाथ जोड़ बोला ""दोस्त की मदद की। ब्राम्हण को दान दिया भगवान ने उसका फल दिया।"

सुदामा हंस दिया और मनमें सोचा "कंजूस कही का! ईस भद्दे कद्दू को देकर यह उसे दान समझता है!"

ऐसा सोचता हुवा वहाँ से निकल गया. खुशी खुशी वह अपने घर की और कदम बढाने लगा, उसे मन में पुरा विश्वास था की आज तो इतिहास दोहराया ही जाएगा उसकी आंखो के सामने फिर से वह दृश्य दिखने लगा कितने प्यार से किसनशेठ उसके पौवो को खा रहे थे, क्या उसका झोपडा महल बन गया होगा? इंसान जब विचारो में चलता है उसे पता ही नही चलता की कब रस्ता कट गया वह अपनी मंज़िल से अब कुछ ही दुरी पर था। बस और कुछ कदम और वो अपने घर के सामने!

सभी रहस्य को खुलने में कुछ कदम का फासला था।

झोपड़ी या महल?

वही टुटा पलंग या मखमल की गद्दी?

सभी सवालों के जवाब बस कुछ कदम दूर थे!

अकसर देखा जाता है की परिक्षा की घडी में कुछ लोग परिणाम से ज्यादा डरते है!

जब सवाल जिंदगी या मौत का हो तब इन्सान परिणाम से कुछ ज्यादा ही डर जाता है।

सुदामा के साथ भी वही हुआ।

आगे बढ़ते उसके कदम रुक गए।

और वो वापिस मुड गया। और सीधा गाव के मंदिर के बाकड़े पे जा बेठा।

उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धडक रहा था।

उसने मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति को देखा उसे लगा मानो मूर्ति उसे देख मुस्कुरा रही है। जैसे कह रही हो "बेटा तेरी सभी मनोकामनाए पूरी हो।"

उसने आखे मुंद ली और सोचने लगा क्या इतिहास दोहराया जाएगा?

क्या पौराणिक कहाँनी में हुआ था एसा चमत्कार फिर से होगा? क्या भगवान उनपे कृपा करेंगे?

मानो वो सोच रहा है एसा न हुआ तो? तो क्या वो भगवान की भक्ति छोड़ देगा? फिर उसने सोचा "न भगवान को क्यों दोष देना उसके या उसकी बच्ची के नसीब में जो होगा वही उसे मिलेगा पिछले जन्मो के कर्मो के फल अगर इस जन्म में खाने हो तो उसमे ईश्वर को या किसी को भी दोष देकर क्या फायदा?"

आज अगर कुछ भी होता है वो भगवान पर विश्वास रखेगा और उनकी और ज्यादा सेवा में लग जाएगा। वो कुछ दे या ना दे।“

इस विचार से उसके मन में एक नई चेतना आई।

सुदामा ने बाकडे पे रखी अपनी थेली उठा। कृष्ण भगवान की मूर्ति को नमन किए। और घर की और जाने लगा तभी उसकी नजर मंदिर पे लगी एक तख्ती पर पड़ी जिस पर लिखा था। "भगवान के पास तू वो मांगता है जो तुझे अच्छा लगता है। पर भगवान तुझे वो देता है जो तेरे लिए अच्छा है।" अब सुदामा खुश हो गया।

सभी चिंता से मुक्त हो वो अपने घर की और जाने लगा।

जब वो घर के नुक्कड़ के पास पहोंच गया उसने अपनी आँखे बंध करली। उसे उसके घर का रस्ता अच्छी तरह से पता था। आँखे बंध कर वो अपने झोपड़ी के पास पहुँच गया। एक लम्बी साँस ले। उसने कृष्ण भगवान को याद किया। और मनमें गिनती करने लगा

सुदामाने अपनी आँखे खोली।

सुदामाने आँखे खोली उसने देखा उसके सामने उसका वहि पुराना झोपड़ा था। एक पल में वो सीधा आसमा से जमीन पर आ गया।

उसने भारी मनसे अपनी झोपड़ी में प्रवेश किया सामने उसे उसकी पत्नी दिखाई दी चुला फूंकते हुए।

उसकी लड़की ने किताब हाथ से रखते हुए कहा "आ गए पिताजी?" सुदामा कुछ न बोला। और जाके सीधा चारपाई पर लेट गया। उसकी नजर उसके घर के कृष्ण भगवान की मूर्ति पर गई। मूर्ति हंस रही थी। या सुदामा को चिडा रही थी!

उसकी पत्नी ने पास आकर कहा "अजी सुनते हो। सब्जी के लिए कुछ नहीं है। तो बाजार से कुछ ले आओ।"

सुदामा भारी ह्रदय से बोला। "मेरे मित्र ने कद्दू दिया है मेरी थेली में है, उसी की सब्जी बना दो।"

थेली में से कद्दू निकाल उसकी पत्नी रसोई घर में चली गई। सुदामा फिर लेट गया।

अजी ये देखो। उसकी पत्नी बुरी तरह से चिल्लाई।

वो भाग कर रसोईघर में गया। उसकी बीवी बोली।

"अजी ये देखो में ने ये कद्दू काटा तो उसमे से ये स्वर्ण मुद्राये और चिठ्ठी निकली है।"

सुदामा तो ढेर सी सुवर्ण मुद्राए देख अचंभित हो गया। कापते हाथो से उसने चिठ्ठी हाथ में ली और पढ़ने लगा।

मेरे प्यारे मित्र

सुदामा,

मेरी कंजूस पत्नी से छिपाकर और उससे झूठ बोलकर ये तुच्छ भेट तुम्हे दे रहा हु। उसे स्वीकार कर। इस से तेरी बहोत से तकलीफे दूर हो जाएगी, अपना एक अच्छा घर बनवाना और हा बेटी की शादी धूमधाम से करवाना।

सुदामा तू वैसा का वैसा ही रहा। अपनी तकलीफे बता मैंने सामने से मदद के लिए पूछा तो मना कर दिया! क्या में तेरा कोई नहीं?

तेरे सूखे पौवे खाते वक्त मुझे एहसास हुआ की दोस्त तू क्यों अपना टिफ़िन छुपा के खाता था। मैंने तुझे जब कहा की तू हमारे टिफ़िन साफ करता था। दोस्त तब भी तू कुछ न बोला?

तू बोल सकता था की हमें पढाई में मदद तू ही करवाता। आज में जो पढ़ा हु दोस्त तेरी बदौलत। सच में पैसे के कारण जब तूने पढाई छोड़ी तब मैंने तेरी फी भरने के लिए कहा। तो तब भी तूने मना कर दिया! उसमे भी मेरा ही स्वार्थ था दोस्त तू साथ होता तो पढाई और आसानहो जाती!

में तुझे सीधे मदद कर सकता था। पर मुझे बीवी का डर था और यकीन था की तू मदद मांगेगा नहीं और लेगा नहीं। कहता भगवान सब भला करेंगे मुद्राए ले लौटाने वापिस मत आना। मेरी और से ये बच्ची की शादी का तोहफा समझना।

तेरा दोस्त

कद्दू

सुदामा गीली आँखों से किसन भगवान की मूर्ति को देखने लगा मूर्ति हंस रही थी। सुदामा को किसन शेठ के वे शब्द अब समझ में आए "दोस्त की मदद की। ब्राम्हण को दान दिया भगवान ने उसका फल दिया।" वो मुस्कुराकर सोचने लगा

"सचमुच थोड़े अलग अंदाज से इतिहास दोहराया.. इतिहास दोहाराया.. इतिहास दोहराया.. इतिहास दोहाराया...."


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