Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

ARVIND KUMAR SINGH

Abstract Tragedy Inspirational


4.5  

ARVIND KUMAR SINGH

Abstract Tragedy Inspirational


स्त्री

स्त्री

1 min 409 1 min 409

सदियों से नारि लड़ती रही है

स्वछंद हवा में विचरण को

तनिक संवर जो खडी हो रही

पुरुष सामने उसके रण को


ईश्वरीय सर्वश्रेष्ठ इस कृति ने

कितने अत्याचार झेले हैं

व्यथा किसी से कह न सकें

दिल मे अश्कों के मेले हैं


सहमी देखी आज भी नारी

गली शहर और गांव में

घात मे बैठे दुर्योधन कितने

चीरहरण के दांव मे


बचते बचाते अस्मिता छुपाते

जीवन की डगमग नाव मे

छुपने की जुगत मे भटक रही

छाले लेकर के पांव मे


या तो दे दे जान वो अपनी

या इज्ज्त को कर दे कुर्बान

स्त्री अगर जो जीना चाहे तो

भेडियों का कहना मान


सहती आई सदियों से सारे

गमों को तू चुपचाप

मुंह जब भी खोलना चाहा तो

तुझको ही लगाया पाप


सारे आडंबर आते हैं इसको

समाज बडा ही शातिर है

पंच भी कर देंगें पाप मुक्त 

जो तू गर उनकी खातिर है


तू ही समझ ले कैसे तुझको

इस समाज मे रहना है

आगे बढने से रोकेगा हरदम

और दुर्गति भी सहना है


Rate this content
Log in

More hindi poem from ARVIND KUMAR SINGH

Similar hindi poem from Abstract