STORYMIRROR

सुरभि शर्मा

Tragedy Action Classics

4  

सुरभि शर्मा

Tragedy Action Classics

सृजन

सृजन

1 min
249

हाँ, हर स्त्री

किसी न किसी मोड़

पर शायद, 

पुरूष होना चाहती है।


वो पुरुष तब होना चाहती है 

जब उसका मन हिरणों

सा कुलांचे मारना चाहता है

पर जकड़ दिए जाते हैं 

उसके पाँव जंजीरों में उसे 

परायी अमानत बता।


वो पुरुष तब होना चाहती है जब 

उससे उम्र में छोटे भाई को 

दे दिया जाता है उस पर 

नजर रखने का मालिकाना हक।


वो पुरुष तब होना चाहती है जब 

पुरुष बड़े चटखारे ले 

अपने प्रेम प्रसंग सुनाते हैं, 

पर अपनी घर के स्त्रियों 

की बाबत वो हमेशा 

घूँघट में दिखनी चाहिए।


वो पुरुष तब होना चाहती है 

जब कर दिया जाता है उसका दान 

और बाँध दिया जाता है खूँटे से 

दूसरे के आंगन में, 

जहाँ लोग अपने बहू की तुलना 

दुधारू गाय से करते हैं 


जिस पर घर के हर सदस्य का 

अलग अलग तरह से अधिकार हो जाता है, 

उसे तानों, तेवर, के जेवर से 

सुसज्जित करने का।


वो पुरुष तब होना चाहती है 

जब उठाती हैं हर महीने की 

असहनीय पीड़ा, 

और उसमें भी 

अपने कर्तव्यों के प्रति 

किसी तरह के चूक हो 

जाने की हीनभावना।


हाँ, होना चाहती है 

हर उस मोड़ पर 

स्त्री पुरुष मानिंद 

जहाँ बड़ी बेतकल्लूफ़ी से 

पुरुष की हर कमी का बोझ 

स्त्री पर डाल दिया जाता है।


हाँ पर जब बात आती है 

नवसृजन की, 

तो शायद एक स्त्री 

वहां पुरुष

कभी नहीं होना चाहती।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy