सर्दी की धूप।
सर्दी की धूप।
खिल उठी है सर्दी की धूप
छट गई है धुंध।
दूर तक फैला है सुनहरा उजारा
आज का दिन है कितना प्यारा।
मन पर छाए थे अंधियारे के बादल।
दूर तक कुछ दिखता ही नहीं था।
अलसाए से पड़े थे चारपाई पर
हम।
रोशनी का कोई ओर छोर मिलता ही नहीं था।
कंपकंपा रहे थे विचार ,सर्दी थी बहुत।
खुशियां कहीं जम सी गईं थी।
उदासी कहीं ठहर सी गई थी।
चाहता था आना तेरे पास लेकिन चली गई थी तू दूर बहुत।
जमी हुई उदासी ने मन को तोड़ा था।
खुद पर छाई बेबसी ने कुछ भी ना छोड़ा था।
तभी किरण उम्मीद की कुछ दूर नजर आई।
मन में जागी स्फूर्ति वह शरीर तक चली आई।
गालों पर आभा गुलाबी फिर से छा आई।
होठों पर दबी मुस्कुराहट फिर से चली आई।
सोचा जो सकारात्मक,
छंट गई मन की धुंध।
उम्मीदों ने बिखेरी खुशियां
और खिल गई सर्दी की धूप।
