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Shivanand Chaubey

Drama

4  

Shivanand Chaubey

Drama

सफर

सफर

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निकले हैं मोहब्बत के अंजान इस सफर पर

मंजिल नहीं कोई है ना कोई कारवां है,

उम्मीद की किरण भी कोई नहीं है बाकी

 है प्रेम के मुसाफिर ना कोई इस शहर में।


प्रेम की कहानी है त्याग समर्पण की

गंगा के जल सी पावन शिशु भाव सी है निश्छल,

मीरा के भक्ति सी है तुलसी की है रामायण

बलिदान की हैं गाथा जीवन के इस समर में।


घीर से गए बिरह की है कैसी व्यथाओ में

पथ पर घना अंधेरा दिखता न घटाओ में,

सब बंधनों में जकड़े रिश्तो की डोर से हैं

कब द्वार मुक्ति पथ का आएगा इस सफर में।


जन्म और मृत्यु भी तो जीवन का एक सफर है

मिलते हैं बिछड़ते हैं कुदरत का यह नजर है

हर पल है सब सफर में पथ पर यूं चलते जाते

अनजान इस सफर पर हैं भूलते याद आते।


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