STORYMIRROR

Rajendera Suthar

Drama

3  

Rajendera Suthar

Drama

पिया

पिया

1 min
188

मैं नित रोती हूँ करती हूं रुदन

खैर पिव के लिए

पिव है सो प्यासा धन का करता है संग्रह

कमाई अपनी विदेशों में

मैं दिन दिन छीजत टूटत मन को

करती हूँ बाट देखती पिव की

आता है मास वसन्त का 

कुहकती है कोयल भी 

देख उसके मन को रात होती निडर

पिया बिनु वसन्त पतझड़

लगता है 

मास आता श्रावण का घनघोर घटा उमड़ती है

मोर कुहकते गर्जना होती है

पिव पिव सुन ध्वनि पिया की याद आती है

सुन सखी भी मुझे ढांढस देती है

पिव है जो चकवा चकवी 

रात में भी बतियाते है 

जब बिछुड़ के हाल एक दूसरे का सुनाते हैं

दिन दिन छीजत पिव बिनु 

नैन नीर बरसता है।। 



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Drama