सफर वो सुहाना था
सफर वो सुहाना था
मंज़िल का तो पता नहीं सफर वो सुहाना था।
उसका मेरी गली में यूँ ही आना जाना था।
मेरे घर तक पीछा करती चुप्पी का फ़साना था।
मंज़िल का तो पता नहीं सफर वो सुहाना था।
कालेज की लाइब्रेरी में किताबों के बीच से झांकती,
नज़रों का अफसाना था।
आँखों ही आँखों में बयाँ होती ख़ामोशी का तराना था।
मंज़िल का तो पता नहीं सफर वो सुहाना था।
बिन इकरार के बेकरारी का ज़माना था।
मिलने का वादा ना था फिर भी
इंतज़ार में रुक जाना था।
मंज़िल का तो पता नहीं सफर वो सुहाना था।

