शज़र अब ठूँठ बन गया
शज़र अब ठूँठ बन गया
आज कुछ लेखा जोखा जो ,
करने बैठे तो दिल टूट गया !
इस जीवन की आपाधापी के,
संघर्ष में बहुत कुछ छूट गया !
आज जो गौर से चेहरा देखा ,
मेरा आईना मुझसे रूठ गया !
शजर को सींचते रहे उम्र भर ,
पर वो भी एक दिन ठूँठ गया !
बनें सिकंदर नाज़ किया खुद ,
जिस पर वो भाग्य ही फूट गया !
अब तो क्या सहेज़े क्या संभालें,
महामारी से घरबार लूट गया !
