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Shailaja Bhattad

Abstract Inspirational

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Shailaja Bhattad

Abstract Inspirational

शरद पूर्णिमा का रास

शरद पूर्णिमा का रास

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तन पवित्र, मन पवित्र रोम रोम तृप्त है।

शशि की शीतलता में रास से संतृप्त है।

जीवन एक मधुबन सहज सरल सुंदर, उस पर यमुना का जल

 सत्संग से संतृप्त है,

 महारास से संतृप्त है।

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16 कलाओं से संपन्न पूर्णिमा के चांद में रास का त्यौहार है, महारास का त्यौहार है।


अश्विन की पूर्णिमा, रास की पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा खास है।

कृष्ण की वंशी, मृदंग की मधुर तान में होता राधा रास है।

 वृंदावन के रास में पुलकित धरा आसमान है।

गोपी संग पत्ता-पत्ता करता महारास है।

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राधा की पैंजनियाँ करती महारास है।

टिमटिमाती रात में सोम की शुभ्रता का वास है।

अनुपम श्रृंगार राधेश्याम का जगमग सारा संसार है।

देवता प्रकृति सब मिल करते महारास है।

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कान्हा की सुखद स्मृतियाँ, वृंदावन को पावन करती।

महारास की मधुर स्मृतियाँ, जन-जन को पुलकित करती।

भक्ति प्रेम की बही ऐसी धार है, 

जा रहे भक्त भवसागर के पार है।

अटूट भक्ति, भक्ति अंतिम चरण पर आई है।

रास में, महारास में जगत स्वामिनी राधा की मान बढ़ाई है।

केशव संग रास में नवल किशोरी राधा की छवि निराली छाई है।

अमृत की बूंदों से दिव्यता आयी है।

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यमुनाजी की तरंगे थिरकती। श्याम की बंसी संग जुगलबंदी करती।

कृष्ण-राधा रास देख स्वरास करती।

शशि किरणों में चांदी-सी चमकती।

वंशी की अनुगूंज करते अचल भी है रास करते।

कण-कण जागृत होता सत् की ओर प्रेरित होता।

मन पवित्र तन पवित्र जब महारास होता।


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