जयश्री राम
जयश्री राम
शक- संशय छूटते चले, ध्यान में हरि ही रहे।
प्रभु सेवक मुझे बना लो बस इतनी-सी है प्रार्थना।
नव प्रकाश उदित हुआ है, ध्यान भी गहरा हुआ है।
भक्ति का पर्याय बना दो, बस इतनी-सी है प्रार्थना।
प्रभु नाम में लिप्त रहूँ, चित्त अपना शुद्ध रखूँ।
महती कृपा कर डालो प्रभुजी// हर भाव मुखरित हो, बस इतनी-सी है प्रार्थना।
दृष्टि में असीम हैं, विराट प्रभु स्वरूप है।
अनथक पुलकित लीन रहूँ मैं, बस इतनी-सी है प्रार्थना।
पुण्य प्रबल प्रभाव है परिपूर्णता का भाव है।
आत्मा की गहराई में रचा बसा प्रभु धाम है।
गहन प्रीति हो जाए प्रभु से, बस इतनी सी है प्रार्थना।
प्रभु जाप ही शुभ कर्मों का शुभारंभ है।
इहलोक ही नहीं परलोक भी सुधारक है।
आत्मबोध करा देना प्रभु इतनी-सी है प्रार्थना।
भव पार लगा देना, बस इतनी-सी है प्रार्थना।
अहर्निश प्रभु द्युति में रहूँ, सुसंस्कारों से संस्कारित बनूँ इतनी-सी है प्रार्थना।
मेरे स्मित चित्त का प्रभु कारण बने, करुणा का आलोक जगे इतनी-सी है प्रार्थना।
सह्रदय बनूँ अंतरह्रदय सहलाती रहूँ, प्रभु ध्यानमग्न रहूँ इतनी-सी है प्रार्थना।
