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Shailaja Bhattad

Abstract inspirational

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Shailaja Bhattad

Abstract inspirational

ओम नमः शिवाय

ओम नमः शिवाय

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पंचामृत से अभिषेक कर भक्ति की ज्योत जलाई है।

किया अनुष्ठान विधि-विधान से अंतर में रिक्तता आई है।

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 डमरू ध्वनि सृष्टि में गूँजे, ईश्वरत्व का भाव भरे।

 आध्यात्मिक यात्रा पर निकले हैं, आत्मिक उद्धार प्रभु करें।

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संयम का आभूषण पहन, शिव पूजा में आए हैं।

 बेलपत्र धतूरा अर्पित, ईश्वर को शीश नवाए हैं। =====

 जागृति की रात्रि आई, महाशिवरात्रि मनाई है।

 मौन धैर्य समर्पण संयम, आस्था की गहराई है।

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 शुद्ध चेतन सत्ता हूँ, यह विवेक प्रभु देना मुझे।

 सहज सरल स्वरूप प्रभु का, प्रभु मर्म यह देना मुझे।

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जाग्रत करती विवेक, शिव की भक्ति।

शांति में शक्ति है, शक्ति का संचयन कराती।

संतुलित यह जीवन बनाती।

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 शांति का विस्तार है ओम नमः शिवाय।

शिव का अनुष्ठान है ओम नमः शिवाय।

 आत्मिक उत्थान है ओम नमः शिवाय।

 पोषण का प्रतीक है ओम नमः शिवाय।

 संतुलन का ध्यान है ओम नमः शिवाय।

 सृष्टि का पुनरुत्थान है ओम नमः शिवाय।

 आत्मज्ञान का वरदान है ओम नमः शिवाय।

 डमरू का नाद है ओम नमः शिवाय।

 ईश्वरत्व की पूर्णता ओम नमः शिवाय।

विरक्ति का भाव है ओम नमः शिवाय।

 जागृति का गान है ओम नमः शिवाय।

 संतुलन का सूत्र है ओम नमः शिवाय।

 जग का उद्धार है ओम नमः शिवाय।

 इष्ट का ध्यान है ओम नमः शिवाय।

 रिक्तता का उत्सव है ओम नमः शिवाय।

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 जपत निरंतर शिव का नाम,

 सुमिरन हर पल त्रिलोकिनाथ।

 जब मन मंदिर में वास है शिव का।

 काम ,क्रोध, मद मोह है किसका।

 भव सागर से सब तर जाते ,

 जब नित्यानंद में खो जाते।

 शिव चरणों में ध्यान लगाएँ,

 जीवन अपना लक्षित हो जाए।

 हे डमरू वाले जगत-पिता ,

 हे त्रिनेत्र महेश्वर मल्लिकार्जुना।

 शरण तुम्हारी आए हैं,

 श्रद्धा सुमन लाएँ हैं।
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 त्रिपुरारी त्रिलोकिनाथ, डमरूवाले तुझे ((कोटि)) प्रणाम ।

 तेरे चरणों में है चारों धाम , रोम-रोम में है शिव नाम ।

 शिवोहम,शिवोहम, शिव है जीवन शिवो हम।

 सर्वव्यापक तू सर्वगुणी, तेरी भक्ति से है शक्ति घणी।
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 सकल दुःख संताप हर्ता,

 हे जगत कल्याण कर्ता।

 तू है सबका पालनकर्ता।
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 शरण तेरी मुक्ति का धाम,
 शिव धुन बजे, ले हरपल शिव का नाम।
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 है महिमा तेरी न्यारी , हे दया के सागर , तेरी भक्ति बड़ी निराली।
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 तेरे चरणों में है मुक्ति धाम,
 शीश नवाऊँ, लूँ शिव का नाम।

 गंगाधराय, भोले सोमेश्वराय,

 कण कण में रमते विश्वनाथाय।

 नीलकंठ हे जगतपिता , हर-हर भोले शिवा-शिवा।

 शिव धुन में सात सुरों की सरगम, सत्यम् शिवम् सुंदरम।

 हे भुवनेश्वर मैं नतमस्तक, कर कमलों से अर्पित करुणा अमृत ।

 परमसुंदर रूप,अद्भुतवाणी,नृत्य अद्भुत

 है अद्भुत सब अद्भुत अद्भुत ।

 महिमा तेरी गहरी है , सर्वत्र शिव भक्ति की लहरी है।


 तेरे संस्मरण से हुई संस्कृति गौरवान्वित,

 तेरे ही प्रेम से है सभी आच्छादित ।

 देवों के देव विश्वेश्वराय, भज हरिओम नमः शिवाय।

 हर हर भोले गंगाधराय, कण कण में रमते विश्वनाथाय ।

 हर हर महादेव शिवशंभो, रोम रोम में है नमो नमो।

 वंदन भोले गौरीशंकर, शीशनवाऊँ शिवभक्ति पाऊँ।

 हे प्रजापालक जगसंचालक, सर्वशांति सर्वसुख की तुझसे कृपा पाऊँ।

 सिद्ध सन्यासी कैलाश निवासी ।

 हे अविनाशी अभयंकर,भीमाशंकर नागेश्वर।

 हे भाग्यविधाता , जग के दाता आदिश्वर ।

 है गणेश, कार्तिकेय के प्यारे, प्रभु जग में सबसे निराले।।

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शिव शरण ही मुक्ति का धाम।

 शीश नवाऊँ लूँ शिव का नाम।

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ज्ञान गुणों की राशि है।

 चिदानंद अविनाशी है।

श्रद्धा पूरित स्तुति करूँ।

 वास प्रभु का काशी है।

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हे डमरू वाले जगत पिता।

 हे त्रिनेत्र महेश्वर मल्लिकार्जुना।

 शरण तुम्हारी आए हैं।

 श्रद्धा सुमन लाए हैं।

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 हर हर शिव की भजते गाथा।

 शिव चरणों में टीका के माथा

 आरति भंजक मूर्तिमान है

 दुर्गम शिव शिवल //अभयंकर विधाता।

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 रोम-रोम गाता शिव गाथा।

 शांति का विस्तार विधाता।

 पंचाक्षर विश्वास बढ़ाता।

 परम तत्व का ज्ञान कराता।

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 शिव नाम भव पार कराता।

 अटूट भक्ति का बोध कराता।

 शिवोहम शिवोहम परम सत्य है।

  परम तत्व का ज्ञान कराता।

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 सुंदर गुणों के भंडार गिरीशा/ आदिनाथा।

प्रनतारति भंजक शिव ईशा// नीलकंठा व्योम केशा

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 शिव वंदन में शीश झुकाएँ।

 भक्ति की धारा बहाएँ।

 विश्वेश्वराय प्रभु महेश्वराय।

 शिव चरणों में ध्यान लगाएँ।

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 शिव ही उद्गम शिव में समाहित।

 शिव महिमा की थाह न पाए।

 शिव स्तुति कल्याणकारी।

डमरू नाद परम हितकारी।

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 शिव भक्ति की अलख जगाएँ।

 ज्योति फिर न बुझ पाए।

शिवोहम शिवोहम परम सत्य है।

 शिव पूजा का सार यही है।

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 शरण है शरण है शिव चरणों में शरण है।

वरण है वरण है शिव गुणों का वरण है।

 नमन है नमन है शिव को नमन है।

 तरण है तरण है शिव नाम ही तरण है।

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शिव भक्ति में सन्नद्ध जब, अहंकार सहज तज जाता है।

 समर्पित भक्ति के आलोक में अभय वर मिल जाता है।
 भक्ति की धारा बही है अध्यात्म का सुख बस यही है।

 मंदिर की घंटी कानों में रस घोले।

 डमरू का नाद सुन,

भक्त भक्ति रस में डोले।


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