शेर,मुक्तकऔर गजल
शेर,मुक्तकऔर गजल
तखली के कायनात में औरत का मरतबा
क्या है ये समझना कोई आसान नहीं है।
दरिया की मौज भी है, किनारा भी है औरत
मजधार का भंवर भी, सहारा भी है औरत।
देखा नहीं है देखकर भी इसको ऐ "अनन्त"
जन्नत का एक हसीन नजारा भी है औरत।
बरसों से सुन रहे हैं के जन्नत है औरतें
गर्मी-ए-खल्क में सुहानी छत है औरतें।
जिनसे पनाह मांगते हैं, जिन्नों बशर सब
पुड़िया है आफतों की मुसीबत है औरतें।
माँ, बहनें, बेटियां हों शरीके हयात हों
हर हाल में अल्लाह की रहमत है औरतें।
लिबास नहीं है जो बदन पे तो ऐ लोगों
सबके लिए सुलभ है, खुली छत है औरतें।
तन्हा किसी भी मर्द को रखते हैं दूर सब
सच मानिएगा आपकी इज्जत है औरतें।
आदम के वास्ते जतन से जिनको बनाया
सरताज न्यायमतों की भी न्यामत है औरतें।
संन्यासियों को लौट के आते हुए देखा
सदियों से आदमी की जरूरत है औरतें।
हैरतजदा हो जानवर भी देखकर कहे
धरती पे खिलखिलाती कयामत है औरतें।
नफरत पे उतर आए तो, नफरत बला की है
भूखी है मोहब्बत की, मोहब्बत है औरतें।
तखलीके कायनात की आधार हैं "अनंत"
ताहश्र कायनात की ताकत है औरतें।
