STORYMIRROR

Alok Singh

Abstract

3  

Alok Singh

Abstract

शेर -1

शेर -1

1 min
234

वह सह लेती है सबकुछ किसी मज़बूरी की तरह

लड़ती है टूटती है वह मेरी हिम्मत की तरह 

मयस्सर तो भी नहीं हैं साँसे अब तो " आलोक"

उधर की रौशनी है चाँद की रौशनी की तरह  



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract