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ca. Ratan Kumar Agarwala

Classics

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ca. Ratan Kumar Agarwala

Classics

शबरी के राम

शबरी के राम

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जन्म हुआ आदिवासी परिवार में, मानते थे जिसे अछूत,

रिश्ता तय हुआ ऐसे व्यक्ति से, रहता था नशे में धुत।

खाता था मांस मदिरा, और कुछ उसे नज़र आता था नहीं,

जान ली जब यह बात, शबरी ने रिश्ता तोड़ने की बात कही।

 

घर में किसी ने न सुनी बात, शबरी को सब ने न कह दिया,

कैसे करती अपनी जिन्दगी बर्बाद, शबरी से चुप रहा न गया।

भाग खड़ी हुई घर से वह, रहने लगी फिर वो घने जंगल में,

मिले कई ऋषि मुनि, सेवा करती थी ऋषियों की तपोवन में।

 

पता चला जब ऋषियों को यह, कि शबरी तो है एक अछूत,

कर लिया किनारा शबरी से सब ने, मन उसका रोया अकूत।

मिल गये शबरी को ऋषि मतंग, अपनाकर दी उसे शिक्षा,

मान लिया शबरी को बेटी, और दी उसे संस्कारों कि दीक्षा।

 

ऋषि मतंग जब हो गये बुढ़े, चले ऋषि मतंग देवलोक को,

कहा शबरी से मतंग मुनि ने, “संभालो अब तुम तपोवन को”।

 शबरी का मन चंचल हुआ, संग जाने के जिद वो करने लगी,

थी सिर्फ दस साल की शबरी, हाथ मुनि का थाम रोने लगी।

 

रोते देख उसे मुनि हुए व्याकुल, कहा, “बेटी, यूँ तो मत रो,

 आएंगे प्रभु राम इस पथ पर, तुम उनकी यहीं प्रतीक्षा करो”

शबरी मन की बड़ी अबोध, जानती थी सत्य होगा गुरु वाक्य,

“कब आएंगे मेरे प्रभु श्रीराम, कब जागेगा मेरा भी अहोभाग्य?

 

महर्षि मतंग थे ब्रह्मर्षि, जानते थे वह तीनों कालों की कथा,

शबरी को उन्होंने किया नमन, और झुका दिया अपना माथा।

अद्भुत था नजारा अभिराम, गुरु कर रहे शिष्या को नमन,

महर्षि के तेज के आगे, कुछ न बोल सके बाकी ऋषि गण।

 

बोले मतंग शबरी से यूँ, “ पुत्री,  हुआ नहीं प्रभु का जनम,

अभी हुआ नहीं उनके पिता महाराज दशरथ का भी लगन”।

“देवी कौशल्या से उनका होगा विवाह, होगी राम की प्रतीक्षा,

फिर होगा सुमित्रा से विवाह, फिर कैकेयी से, फिर प्रतीक्षा।

 

फिर जन्म होगा श्री राम प्रभु का, पत्नी बनेगी माँ जानकी,

फिर राम को होगा वनवास, संग होंगे लक्ष्मण और जानकी”।

“14 वर्षों का होगा वनवास, वन से हरेगा जानकी को रावण,

तब माँ जानकी की खोज में, आएंगे राम और भाई लक्ष्मण।

 

कहना उनसे ए शबरी तुम, करें प्रभु आप सुग्रीव से दोस्ती,

करा दें आप बाली को मुक्त, होगी तभी अभीष्ट की सिद्धि”।

हुई शबरी बड़ी परेशान, हुई शबरी तब बड़ी किंकर्तव्यविमूढ़,

पूछ लिया उसने गुरु से, “कैसे रह पाऊँगी इतने दिन दृढ़”?

 

हो कर अधीर पूछा उसने, “कैसे होगी इतनी लम्बी प्रतीक्षा?

बोले मतंग, “वे ईश्वर हैं, आएंगे, यही है प्रारब्ध की इच्छा”।

गुरु का आदेश था यह, मान कर शबरी आश्रम में रुक गई,

प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा में बैठी, शबरी की आँखें पथरा गई।

 

हर रोज राह में पुष्प बिखेरती, प्रभु श्रीराम की बाट जोहती,

आश्रम में बैठी बैठी शबरी, हर पल राम की प्रतीक्षा करती।

बस यह दिनचर्या चलती रही वर्षों, था उसका चित्त अबोध,

एक दिन फूलों पर राम के चरण पड़े, कंठ हुए अवरुद्ध।

 

आँसुओं की धारा बह रही थी, सत्य हुआ गुरु वर का कथन,

प्रतीक्षा का फल ही था यह, प्रभु खा रहे थे शबरी की जूठन।

बड़ा अद्भुत पल था यह, निहार रहा था सारा ये ब्रह्माण्ड,

ऐसे ही मर्यादा पुरुषोत्तम थे राम, जयकार का हुआ निनाद।



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