सदक़ा
सदक़ा
जनवरी की मुहब्बत
बन गयी फ़रवरी की कहानी
मार्च तक लोगों की
ज़ुबाँ पर थी यही ज़बानी
अप्रैल के गर्म मौसम ने
उतार दिया प्यार का बुखार
मई के आगमन को
जून भी था तैयार
जुलाई तक ये मुहब्बत
मानो फ़ना हो चली थी
शुक्र है अगस्त का जो
थाम लिया उसने दामन को इसके
सितम्बर के आग़ोश में
लिए अक्टूबर की ठन्डक भरे एहसास के साथ
अब वो जो मुहब्बत
अपने दायरे में सिमट चुकी थी
बाहें फैलाये
नवम्बर को दुआ दे रही थी
और कह रही थी
अब तो मुझे अपने में
समाहित कर लो
अब तो दिसम्बर का
कुछ तो लिहाज़ कर लो
मगर वो नादाँ यही कह सका
उस बेहिसाब मुहब्बत को
मुआफ़ करना वो साल जो
बीत गया तेरी यादों के सहारे
वही मेरा अक़्स था
जो गुज़र गया
किसी न किसी सहारे
अब ये साल नया है
तो मुहब्बत भी नई है
मेरी मुहब्बत अब तुमसे नहीं
उस खुदा से हुई है
जिसने तुम्हें नवाज़ा है
अपनी नवाज़िश करम से
तुम रूठ जाओगी तो
मना लूंगा तुमको
ग़र वो रूठ गया
तो कैसे मनाऊंगा उसको
तुम भी उसी का नूर हो
जिस पर मुझे गुरुर है
तुम भी उसी का शुरुर हो
जो मेरा हुज़ूर है
तुम दग़ा दे सकते हो
मगर वो दग़ा देता नहीं
मांग लूंगा अब सब कुछ उसी से
जो सारे जहाँ को देता है
माना उसकी फेहरिस्त में
मैं अकेला बशर नहीं
कभी तो सुनेगा वो भी मेरी
आज नहीं तो कल सही
मगर जब वो सुनेगा
तब बेहिसाब देगा
जो माँगा नहीं है
वो भी मुझे देगा
हो सकता है मेरी सांसे
तब तक वफ़ा न कर पाये मुझसे
फिर भी कोई गिला नहीं उससे
जब तुमसे गिला नहीं किया
तो उस रब से क्या शिकवा
मेरा दर्द मेरी मुस्कुराहट
सब उसी का तो है सदक़ा.....
