STORYMIRROR

Amit Kumar

Abstract

4  

Amit Kumar

Abstract

सदक़ा

सदक़ा

2 mins
321

जनवरी की मुहब्बत

बन गयी फ़रवरी की कहानी

मार्च तक लोगों की

ज़ुबाँ पर थी यही ज़बानी

अप्रैल के गर्म मौसम ने

उतार दिया प्यार का बुखार

मई के आगमन को

जून भी था तैयार

जुलाई तक ये मुहब्बत

मानो फ़ना हो चली थी

शुक्र है अगस्त का जो

थाम लिया उसने दामन को इसके

सितम्बर के आग़ोश में

लिए अक्टूबर की ठन्डक भरे एहसास के साथ

अब वो जो मुहब्बत

अपने दायरे में सिमट चुकी थी

बाहें फैलाये

नवम्बर को दुआ दे रही थी

और कह रही थी

अब तो मुझे अपने में 

समाहित कर लो

अब तो दिसम्बर का 

कुछ तो लिहाज़ कर लो

मगर वो नादाँ यही कह सका 

उस बेहिसाब मुहब्बत को

मुआफ़ करना वो साल जो

बीत गया तेरी यादों के सहारे

वही मेरा अक़्स था

जो गुज़र गया

किसी न किसी सहारे

अब ये साल नया है

तो मुहब्बत भी नई है

मेरी मुहब्बत अब तुमसे नहीं

उस खुदा से हुई है

जिसने तुम्हें नवाज़ा है

अपनी नवाज़िश करम से

तुम रूठ जाओगी तो

मना लूंगा तुमको

ग़र वो रूठ गया

तो कैसे मनाऊंगा उसको

तुम भी उसी का नूर हो

जिस पर मुझे गुरुर है

तुम भी उसी का शुरुर हो

जो मेरा हुज़ूर है

तुम दग़ा दे सकते हो

मगर वो दग़ा देता नहीं

मांग लूंगा अब सब कुछ उसी से

जो सारे जहाँ को देता है

माना उसकी फेहरिस्त में 

मैं अकेला बशर नहीं

कभी तो सुनेगा वो भी मेरी

आज नहीं तो कल सही

मगर जब वो सुनेगा

तब बेहिसाब देगा

जो माँगा नहीं है

वो भी मुझे देगा

हो सकता है मेरी सांसे 

तब तक वफ़ा न कर पाये मुझसे

फिर भी कोई गिला नहीं उससे

जब तुमसे गिला नहीं किया

तो उस रब से क्या शिकवा

मेरा दर्द मेरी मुस्कुराहट 

सब उसी का तो है सदक़ा.....

   

     


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract