सदन त्याग जो चल पड़े
सदन त्याग जो चल पड़े
आओ मित्रों पीड़ा जानें, सदन त्याग जो चल पड़े।
आश्रय की चिंता भी उनको, हैं धूप में हुए खड़े ।
आपद को कारण नित जानें, मोह गेह का तज चले।
हित करने दो हाथ बढ़ाते, मिलते हैं कुछ लोग भले॥१॥
शिशु को गोद लिए चलते हैं, बालक संग संग चले ।
बोझ तले वे नित चलते हैं, यूँ ही उनके दिन ढले ।
पाते अन्न कहाँ खाने को, कैसे उनका पेट पले।
हित करने को दो हाथ बढ़ाते, मिलते हैं कुछ लोग भले॥२॥
चलते सड़कों पर निश दिन वे, मंजिल उनकी दूर है।
थके हुए हैं चलते-चलते, हिम्मत चकनाचूर है ।
ईश्वर से विनती करते हैं, कब कठोर विपदा टले ।
हित करने दो हाथ बढ़ाते, मिलते हैं कुछ लोग भले॥३॥
